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New Delhi: भारत इस वक्त एक साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी की गिरफ्त में है। एक ताजा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने देश में तेजी से पैर पसार रही डायबिटीज की बीमारी को लेकर डराने वाली चेतावनी जारी की है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। यदि यही रफ्तार जारी रही, तो अगले 30 सालों में यह बीमारी भारतीय अर्थव्यवस्था पर दूसरा सबसे बड़ा बोझ बन जाएगी, जिससे देश को लगभग 1.6 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है।
यह अध्ययन दुनिया के 204 देशों में डायबिटीज के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण कर तैयार किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर यह बीमारी अगले तीन दशकों में 10 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ डालेगी, जिसमें सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में अमेरिका और चीन के साथ भारत का नाम प्रमुखता से शामिल है।
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भारत में इस बीमारी का ग्राफ किसी विस्फोट से कम नहीं है। साल 2000 में जहां मरीजों की संख्या 3.2 करोड़ थी, वहीं 2017 तक यह 7.3 करोड़ हो गई और अब यह 10 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले भारत संक्रामक बीमारियों (मलेरिया, डेंगू, कॉलरा) से लड़ रहा था, लेकिन साल 2000 के बाद शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों का रास्ता खोल दिया।
क्यों बन रहा है भारत ‘डायबिटीज की राजधानी’? विशेषज्ञों ने इसके पीछे तीन प्रमुख कारण बताए हैं:
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खान-पान में बदलाव: पारंपरिक फाइबर युक्त भोजन की जगह अब मैदा, चीनी, रिफाइंड तेल और प्रोसेस्ड जंक फूड ने ले ली है।
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शारीरिक निष्क्रियता: दफ्तरों में घंटों बैठकर काम करना और पैदल चलने की आदत खत्म होने से मोटापा और डायबिटीज बढ़ रहा है।
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मानसिक तनाव और प्रदूषण: बढ़ता डिप्रेशन और वायु प्रदूषण भी इस क्रोनिक बीमारी के बड़े ट्रिगर माने जा रहे हैं।
चिंता की बात यह है कि देश की एक बड़ी आबादी ‘प्री-डायबिटीज’ की स्थिति में है, जिन्हें अपनी बीमारी का आभास तक नहीं है। यह रिपोर्ट भारत के लिए एक कड़ा संदेश है कि यदि अब भी जीवनशैली और स्वास्थ्य नीतियों में सुधार नहीं किया गया, तो यह संकट देश के विकास की गति को धीमा कर देगा।
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