India News: पिछले सोमवार लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास हुए कार धमाके ने दिल्ली को एक बार फिर वही झटका दिया, जिसकी आवाज 2011 में भी सुनाई दी थी। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ हो। राजधानी इससे पहले भी कई बार ऐसी वारदातों की शिकार रह चुकी है। बीते 25 सालों के रिकॉर्ड देखें, तो आतंकियों ने दिल्ली को कुल 25 बार निशाना बनाया है—हर बार नए सबक, नए वादे और फिर वही लापरवाही देखी गई।

देशभर में इसी अवधि में 6,289 धमाके हुए, जिनमें 25 केवल दिल्ली में हुए। कई हमलों में निर्दोष लोग मारे गए, कई में भारी नुकसान हुआ, लेकिन हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि लगातार घटनाओं के बावजूद सुरक्षा तंत्र को लेकर सवाल आज भी जस के तस हैं।

2008 से 2025 के बीच देश में 13 बड़े आतंकी हमले हुए। इन घटनाओं ने 788 से ज्यादा लोगों की जिंदगी छीन ली। विशेषज्ञ बताते हैं कि यह आंकड़ा चिंता का विषय तो है, लेकिन एक राहत यह भी है कि साल 2000 के बाद से आतंकी हमलों में 74 प्रतिशत की कमी जरूर आई है। फिर भी राजधानी पर छाया खतरा खत्म नहीं हुआ।
सबसे ज्यादा हमले मणिपुर (1027) और असम (696) में दर्ज किए गए, जबकि दिल्ली जैसे हाई सिक्योरिटी ज़ोन में भी चूक बार-बार पकड़ में आती रही है।

2015 में आकस्मिक विस्फोटों की संख्या सबसे ज्यादा 809 पहुंची थी। यह बताता है कि कई जगहों पर सुरक्षा प्रोटोकॉल कागजों में सख्त दिखते हैं, लेकिन मैदान पर उतने प्रभावी नहीं। 2005 वो साल था जब 420 धमाकों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था।

अब सवाल यह है कि इतने सालों के बाद भी दिल्ली जैसे शहर में बार-बार धमाके कैसे हो जाते हैं? क्या सुरक्षा एजेंसियों की खामियां ही इस खतरे का कारण हैं, या आतंकियों की रणनीति हर बार एक कदम आगे निकल जाती है?
यह बहस हमेशा की तरह फिर से ताज़ा हो गई है।

Share.
Exit mobile version