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Social News: लंबे समय तक जानवरों और इंसानों की समझ व बुद्धिमता को अलग-अलग स्तरों पर आंका गया। कई शोधों में यह देखा गया है कि कुछ जानवरों में इंसानों जैसी बुद्धिमत्ता की झलक मिलती है। 20वीं सदी की शुरुआत में जर्मनी का एक घोड़ा इस सोच को बदलने का कारण बना, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा।
इंसानों की तरह गणितीय गणनाएं कर सकता था एक घोडा
इस घोड़े का नाम था क्लेवर हंस, जिसके बारे में दावा किया गया कि वह इंसानों की तरह गणितीय गणनाएं कर सकता है। क्लेवर हंस एक रूसी ट्रॉटिंग घोड़ा था, जिसे बुजुर्ग शिक्षक वॉन ओस्टेन ने वर्षों तक प्रशिक्षित किया। कहा जाता है कि हंस सवालों का जवाब “हां” या “ना” में सिर हिलाकर देता था या फिर अपने खुरों से जमीन पर ठोककर संख्याएं बताता था। यही नहीं, वह दिशाओं में अंतर कर सकता था, रंगों को पहचान सकता था, घड़ी पढ़ सकता था, ताश के पत्तों को पहचान सकता था और कई जटिल अवधारणाओं को भी समझता हुआ दिखाई देता था। उसकी सबसे चौंकाने वाली क्षमता थी कैलेंडर का ज्ञान। वह सवाल का सटीक जवाब देता कि अगर किसी महीने की आठ तारीख मंगलवार हो, तो अगला शुक्रवार किस तारीख को पड़ेगा।
कुछ अनुमानों के अनुसार, उसकी मानसिक क्षमता 13-14 साल के बच्चे के बराबर मानी गई। जाहिर है, इतनी क्षमता को लेकर लोगों में संदेह भी था और सवाल भी। इसी कारण उसकी क्षमताओं की आधिकारिक जांच भी हुई। जर्मन शिक्षा बोर्ड ने 1904 में एक आयोग बनाया, जिसे “हंस आयोग” कहा गया। इसमें शिक्षकों से लेकर बर्लिन चिड़ियाघर के निदेशक तक शामिल थे। व्यापक जांच के बाद यह निष्कर्ष निकला कि हंस के प्रदर्शन में किसी प्रकार की धोखाधड़ी नहीं थी। इसके बावजूद मामला पूरी तरह सुलझा नहीं। जांच को आगे मनोवैज्ञानिक ओस्कर फुंग्स्ट को सौंपा गया। उन्होंने सावधानी से प्रयोग किए और पाया कि हंस वास्तव में गणित नहीं समझता था, बल्कि वह अपने सामने मौजूद इंसानों के सूक्ष्म हावभाव और शारीरिक संकेतों को पढ़ लेता था। जब सवाल पूछने वाले को खुद जवाब पता नहीं होता था, तो हंस भी जवाब नहीं दे पाता था। यानी हंस की बुद्धिमत्ता गणना करने की नहीं बल्कि बारीकी से संकेत पकड़ने की थी। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं कि उसकी क्षमता सामान्य थी।
इंसानों के सूक्ष्म इशारों को पढ़कर सही प्रतिक्रिया देना अपने आप में अद्भुत था। फुंग्स्ट ने भले ही हंस की गणितीय प्रतिभा को नकार दिया, लेकिन वॉन ओस्टेन ने अपने घोड़े पर विश्वास बनाए रखा और जर्मनी भर में उसका प्रदर्शन करवाते रहे। 1909 में ओस्टेन की मृत्यु के बाद हंस कई मालिकों के पास गया और अंततः प्रथम विश्व युद्ध में सैन्य घोड़े के रूप में इस्तेमाल हुआ। माना जाता है कि 1916 में वह युद्ध में मारा गया। क्लेवर हंस की कहानी आज भी यह सवाल खड़ा करती है कि जानवरों की समझदारी को कैसे परिभाषित किया जाए। भले ही वह इंसानों की तरह गणित नहीं समझता था, लेकिन उसकी क्षमता ने यह साबित कर दिया कि जानवरों की बुद्धिमत्ता को कम आंकना गलत होगा।

