रांची: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के 14वें दिन सदन की कार्यवाही विस्थापितों के पुनर्वास और राज्य में गहराते पेयजल संकट के इर्द-गिर्द सिमटी रही। शनिवार को विधायकों ने सरकार को घेरते हुए जनहित से जुड़े इन मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई की मांग की। हटिया विधायक नवीन जायसवाल ने रांची के जगन्नाथपुर मौजा (धुर्वा) में विस्थापितों के लिए बने आवासों के आवंटन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने सरकार से सवाल किया कि आखिर कब तक तैयार मकानों की चाबियां वास्तविक हकदारों को सौंपी जाएंगी?
इस पर विभागीय मंत्री सुदिव्य कुमार ने चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि 393 निर्मित मकानों के लिए पूर्ववर्ती सरकार द्वारा एक निजी एजेंसी से सर्वे कराया गया था। जांच में पाया गया कि सूची में शामिल 108 लोग ‘फर्जी’ या बाहरी हैं, जिनका विस्थापन से कोई लेना-देना नहीं है। मंत्री ने दोटूक शब्दों में कहा कि हेमंत सोरेन सरकार किसी भी कीमत पर बाहरी लोगों को राज्य के संसाधनों पर कब्जा नहीं करने देगी। हालांकि, जमीन वापसी के मुद्दे पर उन्होंने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के आदेशानुसार अधिग्रहित अतिरिक्त जमीन रैयतों को वापस नहीं की जा सकती। सरकार ने अगले सत्र तक इस मामले में ठोस नीति बनाने का भरोसा दिया है।
सूखते कंठ और चापाकल की पुकार
दूसरी ओर, गढ़वा जिले में मंडराते जल संकट ने सदन की चिंता बढ़ा दी। भवनाथपुर विधायक अनंत प्रताप देव ने क्षेत्र को ‘ड्राई जोन’ बताते हुए कहा कि पाइपलाइन योजनाएं अभी भी कागजों तक ही सीमित हैं। उन्होंने मांग की कि विधायकों को पहले की तरह अपने क्षेत्रों में कम से कम 10-10 चापाकल लगाने का कोटा दिया जाए, ताकि गर्मी शुरू होने से पहले ग्रामीणों को राहत मिल सके।
विधायक देव के इस सुर में सुर मिलाते हुए अन्य सदस्यों ने भी अपने क्षेत्रों में पेयजल की किल्लत का मुद्दा उठाया और चापाकल आवंटन की व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की वकालत की। सदन में यह स्पष्ट दिखा कि बढ़ता तापमान आने वाले दिनों में सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाला है।



