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India News: छत्तीसगढ़ के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले में बुधवार को एक बड़ी खबर सामने आई। प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के 13 लाख रुपये के कुल इनामी दंपत्ति—‘मुन्ना’ और उसकी साथी ‘जूली’—ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। लंबे समय से बस्तर के माड़ संभाग और एमएमसी त्रि-राज्यीय ज़ोन में सक्रिय यह जोड़ा कैडर भर्ती, हिंसक वारदातों और रसद आपूर्ति जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल था।
जंगलों के घने अंधेरे से मुख्यधारा की रोशनी तक
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, यह जोड़ा कई वर्षों से जंगलों में छिपकर सुरक्षा बलों को चकमा देता रहा। दोनों घने इलाकों में लगातार मूवमेंट करते थे, जिससे इनकी गिरफ्तारी मुश्किल हो गई थी। लेकिन सरकारी दबाव, लगातार सर्जिकल ऑपरेशनों और संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष ने आखिरकार इन्हें हथियार छोड़ने पर मजबूर किया।
सरकार की पुनर्वास नीति बनी निर्णायक करवट
जिला एसपी लक्ष्य शर्मा ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति-2025 इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है। दोनों ने कहा कि यह नीति “जीवन बदलने वाला कदम” है।
सरेंडर करने वाले माओवादियों को सरकार की तरफ से तुरंत वित्तीय सहायता, मासिक वजीफा, आवासीय प्लॉट, कौशल प्रशिक्षण और दीर्घकालिक सुरक्षा दी जाएगी। अधिकारियों का दावा है कि ऐसे उदाहरणों ने बाकी माओवादियों पर भी मनोवैज्ञानिक असर डाला है।
23 महीनों में 2,200 से अधिक लोग छोड़ चुके हैं हथियार
छत्तीसगढ़ में बीते 23 महीनों में 2,200 से अधिक माओवादी हथियार डालकर मुख्यधारा में लौट चुके हैं। पुलिस का कहना है कि यह आंकड़ा बताता है कि संगठन के भीतर टूटन बढ़ती जा रही है। कई पुराने साथी बेहतर जीवन की तलाश में सरेंडर कर रहे हैं। सुरक्षा बलों का कहना है कि माओवादी इलाकों का प्रभाव क्षेत्र तेजी से सिमट रहा है और त्रि-राज्यीय सीमाओं में बने गढ़ कमजोर हो रहे हैं।
माओवादी विचारधारा कमजोर, पुलिस इसे ‘गेम-चेंजर’ बता रही
अधिकारियों का मानना है कि दंपत्ति का आत्मसमर्पण प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ा कदम है। एक ओर सरकार की सख्ती, दूसरी ओर बेहतर जीवन की गारंटी—दोनों ने मिलकर इस जोड़े को मुख्यधारा की ओर धकेला।
मुन्ना पर 7 लाख और जूली पर 6 लाख रुपये का इनाम था। दोनों को लंबे समय तक सबसे भरोसेमंद कैडर माना जाता था, ऐसे में उनका आत्मसमर्पण माओवादी संगठन को रणनीतिक तौर पर भी बड़ा झटका है।
बस्तर में शांत माहौल की उम्मीद—लेकिन चुनौतियां बरकरार
हालांकि पुलिस इस घटना को बड़ी सफलता मान रही है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि जंगलों में अब भी कई सक्रिय मॉड्यूल मौजूद हैं। फिर भी सरकार को भरोसा है कि पुनर्वास नीति और लगातार ऑपरेशन मिलकर बस्तर को अब एक नई दिशा देंगे।

