Chaibasa News: अक्सर देखा जाता है कि बीमा कंपनियां प्रीमियम लेते वक्त तो बड़े-बड़े वादे करती हैं, लेकिन जब क्लेम देने की बारी आती है, तो नियम और शर्तों का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेती हैं। चाईबासा के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने ऐसे ही एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘नेशनल इंश्योरेंस कंपनी’ और उसकी टीपीए एजेंसी ‘सेफवे’ को कड़ी फटकार लगाई है। आयोग ने पीड़ित उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इलाज का पूरा खर्च और हर्जाना देने का आदेश दिया है।

क्या था पूरा मामला: दिल्ली में इलाज, चाईबासा में इंकार

मामला छोटा निमडीह निवासी राजेश प्रसाद साव से जुड़ा है। उन्होंने “न्यू नेशनल परिवार मेडिक्लेम” पॉलिसी ली थी। अक्टूबर 2022 में गर्दन और कमर की तकलीफ के कारण उन्हें दिल्ली के प्रसिद्ध सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इलाज में ₹2,45,965 खर्च हुए। जब उन्होंने क्लेम किया, तो कंपनी ने “वेटिंग पीरियड” का तकनीकी बहाना बनाकर हाथ खड़े कर दिए। राजेश प्रसाद ने हार नहीं मानी और उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

आयोग की सख्त टिप्पणी: शर्तों का ज्ञान न देना सेवा में कमी

सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी यह साबित ही नहीं कर पाई कि उसने पॉलिसी बेचते समय उपभोक्ता को सभी नियम और शर्तें विस्तार से समझाई थीं। आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल कागजों में छिपी शर्तों का हवाला देकर किसी का जायज क्लेम नहीं रोका जा सकता। आयोग ने माना कि जब पॉलिसी वैध थी और इलाज उसी अवधि में हुआ, तो भुगतान करना कंपनी की जिम्मेदारी है।

ब्याज सहित देना होगा हर्जाना, 45 दिन की मोहलत

आयोग ने अपने फैसले में कंपनी को ₹2,45,965 की मेडिक्लेम राशि तुरंत चुकाने का निर्देश दिया। इसके अलावा, उपभोक्ता को हुई मानसिक प्रताड़ना के लिए ₹20,000 और कानूनी लड़ाई के खर्च के रूप में ₹10,000 अतिरिक्त देने को कहा। कोर्ट ने अल्टीमेटम दिया है कि यदि 45 दिनों के भीतर भुगतान नहीं हुआ, तो कंपनी को 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह फैसला उन हजारों उपभोक्ताओं के लिए उम्मीद की किरण है जो बीमा कंपनियों की मनमानी से परेशान हैं।

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