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New Delhi: देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वां वेतन आयोग अब केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक बड़े संघर्ष का मैदान बन गया है। बढ़ती महंगाई और सातवें वेतन आयोग की विसंगतियों से नाराज कर्मचारी संगठनों ने 12 फरवरी 2026 को एक दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। इस बार की मांगें केवल वेतन संशोधन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कर्मचारी संगठन इतिहास की सबसे बड़ी वेतन और पेंशन वृद्धि की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
क्या है फिटमेंट फैक्टर का गणित?
कर्मचारी संगठनों की सबसे प्रमुख मांग फिटमेंट फैक्टर को लेकर है। वर्तमान में यह 2.57 है, जिसे बढ़ाकर 3.0 से 3.25 करने का प्रस्ताव दिया गया है। यदि सरकार इस मांग को स्वीकार कर लेती है, तो वर्तमान में जो न्यूनतम बेसिक वेतन ₹18,000 है, वह उछलकर सीधे ₹58,500 तक पहुँच सकता है।
यूनियनों ने इस बार एक नया ‘लेवल-वाइज’ फिटमेंट स्ट्रक्चर भी सुझाया है:
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लेवल 1 से 5: 3.0 फिटमेंट फैक्टर
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लेवल 17-18: 3.25 फिटमेंट फैक्टर इससे जूनियर और सीनियर कर्मचारियों के बीच के वेतन अंतराल को कम करने की कोशिश की जा रही है।
हड़ताल की 10 प्रमुख मांगें
कर्मचारी संगठनों ने सरकार के सामने मांगों की जो लंबी फेहरिस्त रखी है, उसमें निम्नलिखित मुद्दे शामिल हैं:
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ओपीएस (OPS) की बहाली: एनपीएस/यूपीएस को पूरी तरह समाप्त कर पुरानी पेंशन योजना लागू करना।
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डीए मर्जर: 50% महंगाई भत्ते (DA) को मूल वेतन (Basic Pay) में शामिल करना।
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अंतरिम राहत: 1 जनवरी 2026 से 20 प्रतिशत अंतरिम राहत का भुगतान।
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बकाया डीए: कोविड काल के दौरान फ्रीज किए गए 18 महीनों के डीए एरियर का भुगतान।
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न्यूनतम पेंशन: इसे बढ़ाकर ₹9,000 प्रति माह करना।
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सालाना इंक्रीमेंट: हर साल 5 प्रतिशत वेतन वृद्धि की गारंटी।
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खाली पदों पर भर्ती: विभागों में रिक्त पड़े पदों को तत्काल भरना।
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जीएसटी में राहत: आवश्यक वस्तुओं पर से जीएसटी हटाना।
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निजीकरण का विरोध: रेलवे और अन्य सरकारी संस्थानों के निजीकरण पर रोक।
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पेंशन बहाली: कम्यूटेड पेंशन की जल्द बहाली।
सरकार पर दबाव
7वें वेतन आयोग के समय 2.57 फिटमेंट फैक्टर लागू हुआ था, लेकिन कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि मौजूदा आर्थिक स्थिति में वह नाकाफी है। 12 फरवरी की हड़ताल केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है, क्योंकि इसमें रेलवे, डाक, और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों के कर्मचारियों के शामिल होने की संभावना है। अब देखना यह होगा कि बजट सत्र और आगामी चुनावों के मद्देनजर सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है।
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