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Islamabad (Pakistan): बॉलीवुड की फिल्म ‘हक’ ने इन दिनों पाकिस्तान के बौद्धिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है। शाहबानो के ऐतिहासिक कानूनी संघर्ष पर आधारित यह फिल्म सरहद पार के दर्शकों को भी काफी पसंद आ रही है। पाकिस्तानी दर्शकों और विशेषज्ञों का मानना है कि यह फिल्म किसी धर्म या मुल्क के खिलाफ नहीं है, बल्कि एक महिला के सम्मान और उसके वाजिब हक की लड़ाई को दिखाती है। इस फिल्म के जरिए वहां तीन तलाक और गुजारा भत्ता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एक नई बहस शुरू हो गई है।
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पाकिस्तान में क्या है तलाक का कानून?
फिल्म के प्रभाव के बीच पाकिस्तान में प्रचलित ‘मुस्लिम फैमिली लॉ ऑर्डिनेंस 1961’ पर भी चर्चा हो रही है। भारत की तुलना में पाकिस्तान में तलाक की प्रक्रिया पूरी तरह से ‘यूनियन काउंसिल’ और लिखित नोटिस पर आधारित है।
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नोटिस की अनिवार्यता: पाकिस्तान में पति को तलाक देने के लिए यूनियन काउंसिल के चेयरमैन को लिखित सूचना देनी होती है और उसकी कॉपी पत्नी को भेजना जरूरी है।
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90 दिन की अवधि: नोटिस के बाद 90 दिनों का समय सुलह के लिए दिया जाता है। इस दौरान एक ‘आर्बिट्रेशन काउंसिल’ बनाई जाती है जो पति-पत्नी के बीच समझौता कराने का प्रयास करती है।
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खुला का अधिकार: यदि पत्नी तलाक चाहती है और निकाहनामे में उसे अधिकार नहीं दिया गया है, तो वह फैमिली कोर्ट में ‘खुला’ के लिए अर्जी दे सकती है।
बच्चों की कस्टडी और गुजारा भत्ता
लाहौर की कानून विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान में तलाक के बाद बच्चों की कस्टडी और गुजारा भत्ता (Alimony) का फैसला ‘फैमिली कोर्ट एक्ट’ के तहत होता है। इसमें सबसे ज्यादा महत्व बच्चे की भलाई (Welfare of the Child) को दिया जाता है। फिल्म ‘हक’ देखने के बाद पाकिस्तानी सोशल मीडिया पर लोग अपनी कानूनी व्यवस्था और महिलाओं की स्थिति की तुलना भारतीय परिदृश्य से कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘हक’ जैसी फिल्में समाज को आईना दिखाने का काम करती हैं। यह फिल्म नफरत फैलाने के बजाय यह संदेश दे रही है कि कानून का ढांचा चाहे जो भी हो, मानवता और न्याय सर्वोपरि होना चाहिए। विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानी नागरिकों के लिए भी यही नियम लागू होते हैं, जहाँ उन्हें दूतावास के जरिए कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है।



