India News: नई दिल्ली से आई ताज़ा रिपोर्टों ने एक अनोखी ऐतिहासिक प्रक्रिया की तस्वीर साफ कर दी है। मणिपुर और मिजोरम के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले बनी मेनाशे समुदाय को इजरायल वापस ले जाने की तैयारी अब तेज़ हो गई है। यह वही समुदाय है जिसे भारत में शिनलुंग के नाम से जाना जाता है और जो खुद को प्राचीन इस्राएली जनजाति मेनासेह का वंशज मानता है।

नेतन्याहू सरकार का बड़ा फैसला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायल की नेतन्याहू सरकार ने भारत सरकार से बातचीत के बाद 5,800 बनी मेनाशे लोगों को 2030 तक उत्तर इजरायल के गैलिली क्षेत्र में बसाने की योजना बनाई है। इजरायल इन लोगों को यहूदियों की 10 खोई हुई जनजातियों में से अंतिम मानता है, इसलिए इनकी वापसी को सांस्कृतिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर बड़ा कदम माना जा रहा है।

शिनलुंग समुदाय कौन है?

शिनलुंग वो लोग हैं जो भारत के मणिपुर और मिजोरम के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। ये तिब्बती–बर्मी मूल के समुदायों से जुड़े हैं।
इनकी खासियत यह है कि ये अपने आपको प्राचीन इस्राएल की खोई हुई जनजातियों में से एक का वंशज मानते हैं।

भारत में लोग इन्हें आमतौर पर शिनलुंग या मिजो–कुकी–चिन समूह का हिस्सा मानते हैं।

बनी मेनाशे कौन हैं?

भारत के पूर्वोत्तर (मणिपुर और मिजोरम) में रहने वाला एक यहूदी समुदाय है, जो खुद को बाइबिल में वर्णित इज़राइल की खोई हुई 10 जनजातियों में से एक, मेनाशे जनजाति का वंशज मानता है।

बनी मेनाशे वही शिनलुंग समुदाय का हिस्सा है, लेकिन धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान के हिसाब से इनकी एक खास पहचान है।

ये मानते हैं कि वे इस्राएल की मेनासेह जनजाति के वंशज हैं — वही जनजाति जो बाइबिल में “दस खोई हुई जनजातियों” में शामिल बताई जाती है।

इनमें से बहुत-से लोग समय के साथ ईसाई बने थे, लेकिन 20वीं सदी में इन्होंने फिर से अपनी यहूदी जड़ों की ओर लौटना शुरू किया।

शिनलुंग और बनी मेनाशे में फर्क क्या है?

बहुत आसान भाषा में समझो:

  • शिनलुंग → यह भारत में समुदाय का स्थानीय नाम है।

  • बनी मेनाशे → यह नाम उनकी यहूदी पहचान को दर्शाता है।

यानी,
शिनलुंग उनकी जातीय–सांस्कृतिक पहचान है,
और बनी मेनाशे उनकी धार्मिक–ऐतिहासिक पहचान

समुदाय की कहानी: मणिपुर-मिजोरम से शुरू हुआ सफर

यरुशलम की रिपोर्टों में बताया गया है कि इस समुदाय के तकरीबन 10,000 सदस्य हैं, जिनमें से आधे भारत में रहते हैं। तिब्बती-बर्मी मूल के यह लोग समय के साथ ईसाई बने, लेकिन 20वीं सदी के उत्तरार्ध में इनकी यहूदी पहचान दोबारा उभरने लगी।

1951 में शुरू हुआ आंदोलन

इस बदलाव की जड़ें 1951 में शुरू हुए उस आंदोलन में मिलती हैं, जब एक आदिवासी नेता ने दावा किया कि उसे सपने में अपनी ‘मातृभूमि’ इजरायल का संदेश मिला। यह विचार लोगों के बीच फैलता गया और समुदाय ने अपनी जड़ों को मनमासी नामक ऐतिहासिक पात्र से जोड़ना शुरू किया।

धार्मिक मान्यता मिलने के बाद बढ़ी रफ्तार

2005 में इजरायल के रब्बी श्लोमो अमर ने इन्हें एक ‘खोई हुई जनजाति’ के रूप में आधिकारिक मान्यता दी। डीएनए परीक्षणों से इनके मध्य-पूर्व मूल की पुष्टि नहीं हुई थी, लेकिन सांस्कृतिक और धार्मिक दावों को पर्याप्त आधार माना गया।

पूर्वोत्तर में यहूदी परंपराओं का पुनर्जागरण

1970 के दशक में चुराचांदपुर के लेखक थांगखोलुन डैनियल लहुंगदिम की किताब ‘इजरायल इहिउवे’ ने इस आंदोलन को मजबूत नींव दी। 1972 में मणिपुर इजरायल फैमिली एसोसिएशन की स्थापना हुई, जिसने यहूदी रीति-रिवाजों और पहचान को दोबारा जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके बाद आइजोल और इंफाल में धार्मिक अध्ययन केंद्र खुले और दशकों की तैयारियों ने समुदाय को फिर से उसकी जड़ों से जोड़ दिया।

2030 तक होगा ऐतिहासिक परिवर्तन

अब दावा किया जा रहा है कि 2030 तक इनकी इजरायल वापसी की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। यह पूर्वोत्तर भारत में चल रहे एक लंबे सामाजिक-धार्मिक अध्याय का नया पड़ाव साबित होगा—जहां एक जनजाति अपनी पुरानी पहचान की ओर लौट रही है।

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