Bihar News: बिहार विधानसभा चुनाव करीब आते ही सियासी दलों में हलचल तेज हो गई है। राज्य में जातीय और धार्मिक समीकरणों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन किया जा रहा है। लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम-यादव (MY) फॉर्मूले को फिर से परखने की कोशिशें हो रही हैं। वहीं, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम इस समीकरण में नई चुनौती बनकर उभरी है।

सीमांचल बनेगा चुनाव का हॉट सीट क्षेत्र

सीमांचल क्षेत्र — कटिहार, अररिया, किशनगंज और पूर्णिया — पर मुस्लिम वोट बैंक का गहरा प्रभाव है। यहां 11 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी 40 फीसदी से अधिक है जबकि 47 सीटों पर वे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि ओवैसी इन इलाकों को अपना चुनावी केंद्र बनाने में जुटे हैं।

ओवैसी की रणनीति और एआईएमआईएम का विस्तार

साल 2020 में एआईएमआईएम ने सीमांचल में पांच सीटें जीतकर सबको चौंकाया था — अमौर, बहादुरगंज, बायसी, कोचाधामन और जोकीहाट। हालांकि, बाद में चार विधायक राजद में शामिल हो गए। इसके बावजूद पार्टी अब 100 सीटों पर उतरने की योजना बना रही है। प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने कहा कि “लोगों को एक नया विकल्प चाहिए, हम वही बनने की कोशिश कर रहे हैं।”

राजनीतिक दलों पर बढ़ा दबाव

एआईएमआईएम की बढ़ती सक्रियता ने राजद और महागठबंधन की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि मुस्लिम वोटों का बंटवारा आरजेडी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है, जबकि भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिल सकता है। ओवैसी ने तेजस्वी यादव से गठबंधन की इच्छा भी जताई थी, लेकिन बात नहीं बनी।

2025 में बदल सकता है समीकरण

बिहार की 17.7 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है। अगर ओवैसी की पार्टी सीमांचल में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखती है, तो एनडीए और महागठबंधन दोनों को नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ सकती है।

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