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Home»India»बंगाल की OBC सूची से 35 समुदाय हटाने की सिफारिश, ज्यादातर मुस्लिम
India

बंगाल की OBC सूची से 35 समुदाय हटाने की सिफारिश, ज्यादातर मुस्लिम

एनसीबीसी ने केंद्र को सिफारिश भेजी है कि बंगाल की केंद्रीय OBC सूची से 35 समुदाय हटाए जाएं। इनमें अधिकांश मुस्लिम हैं। मामला 2026 के चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है।
By Samsul HaqueDecember 4, 20252 Mins Read
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India News: राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने केंद्र सरकार को एक ऐसा सुझाव भेजा है जिसने बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। आयोग ने सिफारिश की है कि राज्य की केंद्रीय OBC सूची से 35 समुदायों को तुरंत हटाया जाए। इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम समुदायों की है। यह वही समूह हैं जिन्हें यूपीए सरकार ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले सूची में शामिल किया था।

आयोग की जांच में बड़ा खुलासा

एनसीबीसी का कहना है कि इन 35 समुदायों को OBC सूची में वैज्ञानिक या सामाजिक-शैक्षणिक आधार पर नहीं, बल्कि लगभग पूरी तरह धार्मिक पहचान के आधार पर रखा गया था। आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष हंसराज अहिर के नेतृत्व में हुई इस समीक्षा में पाया गया कि सामाजिक पिछड़ापन सिद्ध करने वाले आवश्यक मानदंड पूरे नहीं किए गए थे।

सामाजिक न्याय मंत्रालय ने भी संसद को लिखित जवाब में स्वीकार किया कि आयोग ने यह सिफारिश भेजी है। हालांकि इसे लागू करने के लिए संसद से कानून पारित कराना और राष्ट्रपति की मंजूरी लेना जरूरी है।

बंगाल सरकार व केंद्र के बीच बढ़ा तनाव

पूर्व अध्यक्ष अहिर ने बताया कि बंगाल की राज्य OBC सूची में 80% से ज्यादा समुदाय मुस्लिम हैं, लेकिन इनमें से कई सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े साबित नहीं होते। यही वजह है कि आयोग ने इस सूची की दोबारा जांच शुरू की थी।

यह मामला तब और गरमाया जब जून 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2010 के बाद जारी 77 OBC प्रमाणपत्र रद्द कर दिए, जिनमें 75 मुस्लिम समुदायों से जुड़े थे। इसके बाद आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव को कई बार बुलाया, लेकिन वे पेश नहीं हुए।

2026 चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक मुद्दा

यह पूरा विवाद अब राजनीति के केंद्र में आ खड़ा हुआ है। भाजपा का आरोप है कि बंगाल सरकार वर्षों से तुष्टीकरण कर रही है, जबकि टीएमसी इसे केंद्र की “चुनावी रणनीति” बता रही है।

उधर सुप्रीम कोर्ट में भी मुस्लिम समुदायों को OBC सूची में शामिल किए जाने की वैधता पर सुनवाई जारी है। कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ आरक्षण नहीं, बल्कि धर्म आधारित आरक्षण की संवैधानिक सीमा और आने वाले बंगाल चुनाव की दिशा तय करने वाला बन चुका है।

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