Interesting: घने अंधेरे और पेचीदा जंगलों में बिना टकराए तेज रफ्तार से उड़ने वाले चमगादड़ हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली रहे हैं। अब ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के शोधकर्ताओं ने इस रहस्य को सुलझा लिया है। यह खोज न केवल जीव विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भविष्य के ड्रोन और रोबोटिक नेविगेशन को पूरी तरह बदल सकती है।

सिर्फ ‘सोनार’ नहीं, ‘ध्वनि के बहाव’ का कमाल

अब तक माना जाता था कि चमगादड़ केवल ‘इको-लोकेशन’ (प्रतिध्वनि) के जरिए रास्ता ढूंढते हैं। लेकिन नई स्टडी बताती है कि वे “अकूस्टिक फ्लो वेलोसिटी” (ध्वनि प्रवाह की गति) का इस्तेमाल करते हैं। इसका मतलब है कि वे हर टहनी की दूरी नापने के बजाय, ध्वनि के बहाव के पैटर्न से यह समझ लेते हैं कि सामने का माहौल कितना घना है और उन्हें किस रफ्तार से उड़ना चाहिए।

कैसे हुआ यह बड़ा खुलासा?

वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को परखने के लिए एक “बैट एक्सेलेरेटर मशीन” तैयार की। यह 8 मीटर लंबा एक कॉरिडोर था जिसमें 8,000 नकली पत्तियां लगाकर जंगल जैसा माहौल बनाया गया।

  • प्रयोग: जब पत्तियों को चमगादड़ों की ओर खिसकाया गया (जिससे ध्वनि का प्रवाह तेज हुआ), तो चमगादड़ों ने अपनी रफ्तार 28% तक कम कर ली।

  • नतीजा: इससे साबित हुआ कि वे डॉप्लर शिफ्ट (Doppler Shift) के सिद्धांत पर आसपास की गति को महसूस करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमें पास आती एम्बुलेंस के सायरन की आवाज बदली हुई लगती है।

ड्रोन और रोबोटिक्स के लिए क्यों है अहम?

वर्तमान में ड्रोन को बाधाओं से बचने के लिए महंगे और भारी सेंसर्स या कैमरों की जरूरत होती है, जो कम रोशनी में अक्सर फेल हो जाते हैं।

  1. सटीक नेविगेशन: चमगादड़ की इस तकनीक (अकूस्टिक फ्लो) को अपनाकर ड्रोन बिना कैमरे के भी घने अंधेरे या धुंध में सटीकता से उड़ सकेंगे।

  2. सस्ती तकनीक: यह एल्गोरिदम आधारित सिस्टम भारी सेंसर्स का वजन कम करेगा, जिससे छोटे और स्मार्ट ड्रोन बनाना आसान होगा।

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