रांची: राजधानी के प्रतिष्ठित राँची विश्वविद्यालय के अधीन संचालित ‘इंस्टिट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज’ (ILS) में व्याप्त कुप्रबंधन और अव्यवस्थाओं पर झारखंड उच्च न्यायालय ने बेहद तल्ख रुख अख्तियार किया है। न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए शुक्रवार को उच्च शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव, वित्त विभाग के प्रधान सचिव, जेपीएससी (JPSC) सचिव, राँची विश्वविद्यालय के कुलपति, डीन और आईएलएस के निदेशक को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का फरमान सुनाया है।

नियमित प्रोफेसर नहीं, स्वीकृत पद भी गायब

सुनवाई के दौरान अदालत उस समय हैरान रह गई जब राँची विश्वविद्यालय की ओर से बताया गया कि इस संस्थान में प्रोफेसरों का कोई स्वीकृत पद ही नहीं है। अदालत ने तीखा सवाल किया कि बिना नियमित शिक्षकों और स्वीकृत पदों के कानून की पढ़ाई कैसे कराई जा रही है? विश्वविद्यालय के लचर जवाब से असंतुष्ट होकर अदालत ने सभी संबंधित शीर्ष अधिकारियों को जवाबदेही तय करने के लिए तलब किया है।

नए नामांकन पर पाबंदी, छात्रों का भविष्य अधर में

अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए आगामी सत्र से आईएलएस में नए विद्यार्थियों के नामांकन पर पूरी तरह रोक लगा दी है। प्रार्थी अंबेश कुमार चौबे की याचिका पर सुनवाई करते हुए अधिवक्ता अनूप कुमार अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि संस्थान बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के मानकों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहा है। यहाँ न तो योग्य प्रिंसिपल हैं, न पर्याप्त लाइब्रेरी और न ही बुनियादी सुविधाएँ। बीसीआई ने अक्टूबर 2025 में ही कमियां सुधारने के लिए छह महीने का वक्त दिया था, लेकिन संस्थान कुंभकर्णी नींद में सोया रहा। इस लापरवाही की कीमत अब वहां पढ़ रहे 418 विद्यार्थियों को चुकानी पड़ रही है, जिनका भविष्य दांव पर लग गया है।

यह संस्थान स्व-वित्त पोषित (Self-Financed) मॉडल पर चलता है, लेकिन सरकार और विश्वविद्यालय के बीच समन्वय की कमी ने इसे बर्बादी की कगार पर खड़ा कर दिया है। अब शुक्रवार को होने वाली सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं, जहाँ अधिकारियों को अदालत के कड़े सवालों का सामना करना होगा।

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