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Health Desk: फाल्गुन मास का आगमन हो चुका है, जहां एक ओर प्रकृति में पीली सरसों लहलहा रही है और खुशियों का माहौल है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य की दृष्टि से यह समय काफी संवेदनशील होता है। इस दौरान दिन और रात के तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव बना रहता है, जिससे सर्दी-जुकाम और वायरल संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है। आयुर्वेद विशेषज्ञों का मानना है कि इस मौसम में बीमारियों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका आहार में समयानुकूल परिवर्तन करना है।
पित्त की वृद्धि और पाचन तंत्र पर असर
आयुर्वेद के अनुसार, फाल्गुन की शुरुआत होते ही शरीर में पित्त की वृद्धि होने लगती है और कफ का शमन होने लगता है। इस बदलाव से पाचन तंत्र पर दबाव बढ़ता है। पाचन अग्नि के कमजोर होने के कारण इस महीने में चने का सेवन वर्जित माना गया है। चना पचने में भारी होता है और गैस व अपच जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। इसके अलावा बासी, अधिक तैलीय और तामसिक भोजन से भी परहेज करना चाहिए।
बेर और अंगूर हैं स्वास्थ्य के लिए वरदान
इस महीने में सात्त्विक जीवनशैली और संतुलित भोजन पर जोर दिया गया है। आयुर्वेद के अनुसार, फाल्गुन मास में बेर और अंगूर का सेवन अत्यंत लाभकारी होता है। इन दोनों फलों में प्राकृतिक ठंडक देने वाले तत्व होते हैं, जो शरीर के बढ़ते तापमान को संतुलित करते हैं। ये रक्त को शुद्ध करने के साथ-साथ पित्त वृद्धि को भी नियंत्रित करते हैं, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) मजबूत होती है।
सात्त्विक जीवनशैली का महत्व
आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह महीना महाशिवरात्रि के कारण विशेष महत्व रखता है। इस दौरान हल्का व्यायाम करना और सुबह जल्दी उठना शरीर की ऊर्जा को संतुलित बनाए रखता है। ऋतु परिवर्तन के नियमों के अनुरूप चलना न केवल संक्रमणों से रक्षा करता है, बल्कि लंबी अवधि की बीमारियों से भी बचाव में सहायक होता है। विशेषज्ञों का संदेश साफ है—छोटे-छोटे बदलाव भी बड़े रोगों से सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
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