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Home»States»Jharkhand»तंत्र साधना से पशुता से देवत्व तक, आचार्य का प्रेरक संदेश
Jharkhand

तंत्र साधना से पशुता से देवत्व तक, आचार्य का प्रेरक संदेश

Faizal HaqueBy Faizal HaqueMay 4, 20263 Mins Read
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Jamshedpur News: आनंद मार्ग प्रचारक संघ के वरिष्ठ आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत ने सोमवार को गदरा स्थित जागृति कीर्तन मंडप हॉल में आयोजित आध्यात्मिक सभा में हजारों साधकों को संबोधित करते हुए तंत्र साधना की महत्ता और उसके माध्यम से मानव जीवन के उत्कर्ष पर विस्तृत प्रकाश डाला। जिले के विभिन्न इकाइयों के दौरे के बाद आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि साधना का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को उसकी निम्न प्रवृत्तियों से ऊपर उठाकर उच्चतम चेतना तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है।
अपने प्रवचन में आचार्य ने स्पष्ट किया कि हर मनुष्य जन्म से ही विभिन्न प्रवृत्तियों के प्रभाव में रहता है, जिनमें पशुवत गुण भी शामिल होते हैं। लेकिन अनुशासित साधना, संयम और आत्मचिंतन के द्वारा वह धीरे-धीरे अपने भीतर की शक्ति को जागृत कर वीरता की अवस्था में प्रवेश करता है। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए साधक अंततः दिव्यता को प्राप्त करता है, जो जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।
तंत्र शास्त्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक श्लोक के माध्यम से समझाया कि इस धरती पर सभी मनुष्य प्रारंभिक अवस्था में पशु प्रवृत्तियों से युक्त होते हैं, किंतु ज्ञान और साधना के प्रकाश से उनमें वीरभाव का उदय होता है और उसी के सहारे वे क्रमशः देवत्व की ओर अग्रसर होते हैं। उन्होंने कहा कि यह यात्रा एक आंतरिक परिवर्तन की प्रक्रिया है, जिसमें साधक का दृष्टिकोण, व्यवहार और चेतना निरंतर विकसित होती जाती है।
आचार्य विश्वदेवानंद जी ने यह भी बताया कि साधक के आध्यात्मिक स्तर के अनुसार उसके आराध्य का स्वरूप भी बदलता है। प्रारंभिक अवस्था में वह पशुपति की उपासना करता है, वीरता के स्तर पर पहुंचने पर वीरेश्वर को अपना आदर्श मानता है और जब वह दिव्य चेतना को प्राप्त कर लेता है, तब उसका इष्ट महादेव के रूप में स्थापित होता है। यह परिवर्तन साधक की आंतरिक प्रगति का प्रतीक है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आध्यात्मिक मार्ग आसान नहीं है और यह केवल उन्हीं के लिए है जो साहस, धैर्य और समर्पण के साथ आगे बढ़ने का संकल्प रखते हैं। केवल बाहरी दिखावे या आडंबर से साधना का उद्देश्य पूरा नहीं होता, बल्कि इसके लिए परम सत्ता के प्रति सच्चा प्रेम और पूर्ण समर्पण आवश्यक है।
सभा के अंत में उन्होंने साधकों को प्रेरित करते हुए कहा कि जो लोग इस त्याग और साधना के मार्ग पर चल रहे हैं, वे न केवल अपने जीवन को ऊंचाई दे रहे हैं, बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन ला रहे हैं। ऐसे साधक ही भविष्य में देवमानव बनकर समाज को नई दिशा देने का कार्य करेंगे।
कार्यक्रम में उपस्थित सभी साधकों ने आचार्य के विचारों को ध्यानपूर्वक सुना और आत्मिक उन्नति के इस मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
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