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Tehran, (Iran): अमेरिका-इजराइल और ईरान (US-Israel Attacks Iran) के बीच जारी भीषण जंग अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है जहां तेल और गैस के बाद अब ‘पानी’ सबसे बड़ा हथियार बनता दिख रहा है। इजराइली मीडिया ‘वाइनेट’ के मुताबिक, इजराइल ने ईरान के तेल भंडारों और रिफाइनरी केंद्रों पर जोरदार हवाई हमले करते हुए 30 फ्यूल टैंकों और 3 तेल डिपो को पूरी तरह मटियामेट कर दिया है। जवाब में ईरान की ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ ने भी पलटवार करते हुए इजराइल समेत कुवैत, सऊदी अरब, बहरीन और यूएई के 200 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया है।
इस महाजंग के बीच विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि खाड़ी देशों के लिए असली खतरा उनके पानी के ढांचे पर मंडरा रहा है। दरअसल, खाड़ी के अधिकतर देश अपनी प्यास बुझाने के लिए समुद्री पानी को साफ करने वाले ‘डीसैलिनेशन’ (नमक हटाने वाले) प्लांट्स पर निर्भर हैं। अगर इन प्लांट्स पर मिसाइल या ड्रोन हमले होते हैं, तो रियाद, दुबई और कुवैत सिटी जैसे बड़े शहरों में पानी की भारी किल्लत हो सकती है। बहरीन ने तो पहले ही अपने एक वॉटर प्लांट पर ईरानी हमले का दावा कर दिया है।
आंकड़ों की बात करें तो कुवैत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत, ओमान 86 प्रतिशत और सऊदी अरब करीब 70 प्रतिशत पानी इन्हीं समुद्री प्लांट्स से हासिल करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि 2 मार्च को दुबई के जेबेल अली बंदरगाह पर हुआ हमला एक बड़े वॉटर प्लांट से महज 12 मील की दूरी पर था। इसी तरह कुवैत के ‘दोहा वेस्ट’ प्लांट के पास भी नुकसान की खबरें हैं। चूंकि ये वॉटर प्लांट अक्सर पावर प्लांट्स (बिजली घरों) से जुड़े होते हैं, इसलिए बिजली ढांचे पर चोट सीधा पानी की सप्लाई को ठप कर सकती है।
अमेरिकी कूटनीतिक दस्तावेजों के हवाले से एक डराने वाली चेतावनी सामने आई है कि अगर सऊदी अरब के मुख्य वॉटर प्लांट या उसकी पाइपलाइन को गंभीर नुकसान पहुंचता है, तो राजधानी रियाद को एक हफ्ते के भीतर खाली कराना पड़ सकता है। हालांकि, ईरान खुद इन समुद्री प्लांट्स पर ज्यादा निर्भर नहीं है क्योंकि वहां पानी नदियों और बांधों से आता है, लेकिन सूखे की वजह से तेहरान की हालत भी पतली है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान पहले ही आगाह कर चुके हैं कि हालात नहीं सुधरे तो तेहरान को भी खाली करने की नौबत आ सकती है।
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