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India News: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से अटकी ट्रेड डील का सबसे बड़ा रोड़ा ‘डेयरी सेक्टर’ रहा है। अमेरिका चाहता है कि भारतीय बाजार उसके डेयरी उत्पादों के लिए खुले, लेकिन ताजा वैज्ञानिक सर्वे ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिकी दबाव भारत के जमीनी डेयरी ढांचे को खत्म नहीं कर सकता। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में पशुपालन केवल व्यावसायिक लाभ का जरिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक और कृषि परंपरा है।
38 फीसदी पशुपालकों का मकसद दूध बेचना नहीं
हाल ही में 15 राज्यों के 7,350 परिवारों पर किए गए एक व्यापक सर्वे में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। देश के लगभग 38 फीसदी पशुपालक (करीब 3 करोड़ लोग) दूध बेचने के लिए जानवर नहीं पालते। झारखंड जैसे राज्यों में तो यह आंकड़ा 71 फीसदी तक है। ये लोग पशुओं को घरेलू पोषण (खुद के इस्तेमाल), गोबर और खेती के अन्य कामों के लिए पालते हैं। यही कारण है कि विदेशी कंपनियों का बाजार में प्रवेश भारतीय पशुपालकों के इस बड़े हिस्से को प्रभावित नहीं कर पाएगा।
गोबर और बायोगैस: दूध से बड़ी प्रेरणा
अध्ययन में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया है। लगभग 75 फीसदी मवेशीपालक ‘गोबर’ को पशुपालन का मुख्य प्रेरक मानते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गोबर का उपयोग खाद, बायोगैस और वर्मीकम्पोस्टिंग के लिए किया जाता है। सर्वे के अनुसार, 7 फीसदी पशुपालक यानी करीब 56 लाख लोग मवेशियों को सिर्फ इसलिए रखते हैं ताकि खेती में बैलगाड़ी खींचने या खाद बनाने में मदद मिल सके। हिमाचल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में 15 फीसदी लोग पशुपालन की मुख्य वजह ‘धार्मिक और सांस्कृतिक’ आस्था को मानते हैं।
चुनौतियां और बदलती स्वास्थ्य सेवाएं
रिपोर्ट बताती है कि पशुपालकों के सामने सस्ते चारे और आहार की बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में राज्यों का अलग-अलग मॉडल है। जहां पंजाब में 1,389 पशु अस्पताल हैं, वहीं आंध्र प्रदेश ने मोबाइल डिस्पेंसरी (1,558) पर ज्यादा जोर दिया है। कुल मिलाकर, भारत का पशुपालन क्षेत्र दूध की बिक्री से कहीं आगे बढ़कर घरेलू बायोगैस और खाद के मूल्यवर्धन पर टिका है, जो इसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक दबाव से सुरक्षित रखता है।

