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Home»#Trending»शेर सिंह से ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ तक, आज़ादी के इस महानायक की अनसुनी कहानी
#Trending

शेर सिंह से ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ तक, आज़ादी के इस महानायक की अनसुनी कहानी

जलियांवाला बाग के प्रतिशोधी नायक उधम सिंह की पुण्य ति​थि पर विशेष रिपोर्ट
By Muzaffar HussainJuly 29, 20253 Mins Read
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Ranchi News : भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर आज़ादी का बिगुल फूंका। इन्हीं में से एक नाम है महान क्रांतिकारी उधम सिंह का, जिनका नाम जलियांवाला बाग नरसंहार के बदले से जुड़ा हुआ है। 31 जुलाई 1940 को ब्रिटिश हुकूमत ने इस वीर योद्धा को फांसी पर चढ़ा दिया था, लेकिन उनका नाम हमेशा के लिए भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की स्वर्णिम गाथा में दर्ज हो गया।

बचपन की कठिनाइयाँ और संघर्ष

उधम सिंह

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब प्रांत के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। उनका बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता। 1901 में उनकी माता और 1907 में पिता का निधन हो गया। इस दुखद घटना के बाद वे अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में पले-बढ़े। अनाथालय में उनका नाम शेर सिंह से बदलकर उधम सिंह और भाई का नाम मुक्तासिंह से बदलकर साधुसिंह रखा गया।

1917 में बड़े भाई के निधन के बाद वे पूरी तरह अनाथ हो गए। इसके बावजूद उधम सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और 1919 में अनाथालय छोड़ आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े। इतिहासकारों का मानना है कि उधम सिंह सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर “राम मोहम्मद सिंह आजाद” रखा, जो भारत की धार्मिक एकता का प्रतीक है।

जलियांवाला बाग नरसंहार और प्रतिज्ञा

13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग नरसंहार ने उधम सिंह की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। वे इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी थे और सैकड़ों निर्दोष भारतीयों की मौत ने उनके मन में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया। उन्होंने उसी समय माइकल ओ’डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ली, जो पंजाब का तत्कालीन गवर्नर जनरल था और इस हत्याकांड के लिए जिम्मेदार ब्रिटिश अधिकारियों में से एक था।

उधम सिंह ने वर्षों तक इस प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए तैयारी की। उन्होंने अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका का दौरा किया और आखिरकार 1934 में लंदन पहुंचे। वहां उन्होंने एक कार और छह गोलियों वाली रिवॉल्वर खरीदी और सही मौके का इंतजार करने लगे।

लंदन में माइकल ओ’डायर का अंत

ओ’डायर पर गोलियां चलाते उधम ​सिंह

13 मार्च 1940 को लंदन के काक्सटन हॉल में रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की बैठक में माइकल ओ’डायर भी मौजूद था। उधम सिंह इस बैठक में पहले से ही पहुंच गए थे और उन्होंने अपनी रिवॉल्वर को एक मोटी किताब में छिपा रखा था। बैठक के बाद उन्होंने मौके का फायदा उठाते हुए ओ’डायर पर गोलियां चलाईं। दो गोलियां लगते ही ओ’डायर की मौत हो गई।

उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और मौके पर ही गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला और 4 जून 1940 को उन्हें हत्या का दोषी ठहराया गया।

शहादत और अमरता

31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। वे 40 वर्ष की आयु में शहीद हो गए। उनका यह बलिदान ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। उनके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद जो प्रण लिया, उसे पूरा कर दिखाया। उनके हौसलों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाखों युवाओं को प्रेरित किया और आजादी की राह आसान हुई। 

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