रांची: झारखंड के साहिबगंज जिले के निवासियों के लिए शुद्ध पेयजल का सपना अब भी पाइपों के भीतर ही कहीं अटका हुआ है। मंगलवार, 10 मार्च को झारखंड उच्च न्यायालय ने इस मामले पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभाग को जमकर फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक की खंडपीठ ने सरकार को इस अधूरी योजना को पूरा करने के लिए 45 दिनों का अंतिम मौका दिया है।
2008 से चल रहा है फाइलों का खेल
सुनवाई के दौरान अदालत इस बात से बेहद हैरान दिखी कि जो योजना वर्ष 2008 में शुरू हुई थी, वह 2026 में भी ट्रायल रन और रिसाव के बीच फंसी है। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि बार-बार आश्वासन देने का समय अब समाप्त हो चुका है। यदि निर्धारित 45 दिनों के भीतर साहिबगंज के हर घर तक नल से जल नहीं पहुँचा, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ की होगी और उनके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
ग्राउंड रिपोर्ट ने खोली दावों की पोल
अदालत के आदेश पर जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा), साहिबगंज द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट ने सरकार के दावों की हवा निकाल दी। रिपोर्ट के अनुसार, जमीन के नीचे बिछी पाइपलाइन कई जगहों पर क्षतिग्रस्त है, जिससे पानी घरों तक पहुँचने के बजाय सड़कों पर बह रहा है। प्रार्थी सिद्धेश्वर मंडल की ओर से वरीय अधिवक्ता राजीव शर्मा ने दलील दी कि सरकार का योजना पूरी होने का दावा पूरी तरह भ्रामक है, क्योंकि लोग आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।
आंकड़ों में साहिबगंज की स्थिति
सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता शाहबाज अख्तर ने पक्ष रखते हुए कहा कि परियोजना लगभग अंतिम चरण में है। सरकार के मुताबिक, जिले के करीब 19,000 घरों में से 8,500 लोगों ने अब तक नल कनेक्शन के लिए आवेदन दिया है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आंकड़ों की बाजीगरी के बजाय उसे धरातल पर पानी की सप्लाई चाहिए। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब साहिबगंज प्रशासन और पेयजल विभाग में हड़कंप मच गया है। देखना यह होगा कि जो काम 18 सालों में नहीं हो पाया, क्या वह विभाग के ‘चीफ’ अपनी साख बचाने के लिए अगले 45 दिनों में पूरा कर पाएंगे?



