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आजकल कई अभिभावक बच्चों से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद रखते हैं और इसके लिए उन्हें उपहार या किसी चीज का लालच देकर प्रेरित करते हैं। जैसे कि—“अगर तुम परीक्षा में अच्छे अंक लाओगे तो तुम्हें नया खिलौना मिलेगा” या “अगर तुम डांस क्लास में ठीक से सीखोगे तो हम तुम्हें आइसक्रीम खिलाएंगे।” यह तरीका कुछ मौकों पर कारगर हो सकता है, लेकिन जब यह आदत बन जाती है, तो बच्चों का ध्यान काम के मूल उद्देश्य से हटकर केवल इनाम पर टिक जाता है। इससे बच्चों में सतही काम करने की प्रवृत्ति विकसित होती है और उनकी रचनात्मकता धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है।
बच्चों पर अपेक्षाओं का अनावश्यक बोझ न डालें
हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा हर क्षेत्र में अव्वल रहे—चाहे वो पढ़ाई हो, खेल हो, संगीत या नृत्य। लेकिन हर बच्चा हर चीज में माहिर नहीं हो सकता। यदि कोई बच्चा गणित में अच्छा है, तो जरूरी नहीं कि वो चित्रकला या खेल में भी उतना ही अच्छा हो। ऐसे में अभिभावकों को यह समझना जरूरी है कि बच्चे पर जरूरत से ज्यादा अपेक्षाएं न थोपें। ज्यादा गतिविधियों में शामिल करने से बच्चा किसी एक में भी ध्यान नहीं दे पाएगा और वह मानसिक रूप से भी थक सकता है। बच्चे को वही काम करने दें जिसमें उसकी रुचि हो और जिसमें वह सहज महसूस करता हो।
बच्चों को उनकी पसंद के काम करने की आज़ादी दें
अगर आपका बच्चा किसी एक्टिविटी क्लास में नहीं जाना चाहता है, तो सिर्फ इसलिए उसे जबरदस्ती न भेजें कि उसके दोस्त जा रहे हैं। अगर वो घर पर बैठकर रंग भरना चाहता है या अपना पसंदीदा कार्टून देखना चाहता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। ये चीजें उसके दिमाग को सुकून देती हैं और रचनात्मकता को भी बढ़ावा देती हैं। अगर आपके पास समय है, तो उस वक्त को बच्चे के साथ बिताएं, उससे बात करें और खेलें। उसके साथ रंग भरें या कहानियां सुनाएं—ये छोटी-छोटी बातें उसके व्यक्तित्व निर्माण में अहम भूमिका निभाती हैं।
असफलता का डर न दिखाएं
बच्चा तभी किसी कार्य को रचनात्मकता के साथ कर पाएगा, जब उसके मन में हार का डर न हो। उसे यह एहसास कराएं कि असफलता कोई बुरी चीज नहीं है, बल्कि यह सीखने का एक अवसर है। अगर किसी काम में बच्चा असफल हो जाता है, तो उसे डांटने या ताना देने के बजाय समझाएं कि अगली बार वह और बेहतर कर सकता है। “तुमने तो सब खराब कर दिया” जैसी बातें उसके आत्मविश्वास को तोड़ सकती हैं।
बच्चे के लिए समय निकालें
आप चाहे कितने भी व्यस्त क्यों न हों, दिन का कुछ समय केवल अपने बच्चे के लिए जरूर निकालें। उस समय में उसके मन की बात सुनें, उसके सवालों का उत्तर दें, और उसे जीवन के सकारात्मक पक्षों से अवगत कराएं। आप जो समय और समझ उसे देंगे, वही उसकी सोच को मजबूत और सकारात्मक बनाएगा।

