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Health News: आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली और खान-पान में बदलाव के कारण महिलाओं में पीरियड्स (मासिक धर्म) से जुड़ी समस्याएं आम हो गई हैं। हर महीने होने वाले तेज दर्द, पेट की ऐंठन और सूजन से राहत पाने के लिए अधिकतर महिलाएं पेनकिलर का सहारा लेती हैं। हालांकि, योग विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं के बजाय यदि ‘गर्भासन’ को दिनचर्या का हिस्सा बनाया जाए, तो इन समस्याओं को जड़ से कम किया जा सकता है।
क्या है गर्भासन और क्यों है खास?
गर्भासन दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘गर्भ’ यानी भ्रूण और ‘आसन’ यानी मुद्रा। इस योगासन को करते समय शरीर की आकृति मां के पेट में पल रहे एक भ्रूण की तरह हो जाती है, इसीलिए इसे गर्भासन कहा जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह आसन न केवल गर्भाशय को स्वस्थ रखता है, बल्कि अनियमित मासिक चक्र को भी सुव्यवस्थित करने में मदद करता है। इसके नियमित अभ्यास से शरीर और मन के बीच संतुलन बना रहता है।
मानसिक शांति और प्रजनन स्वास्थ्य में सुधार
गर्भासन का प्रभाव केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक भी है। यह तनाव और चिंता को कम कर मन को शांत करने में सहायक है। महिलाओं के लिए यह विशेष रूप से इसलिए उपयोगी है क्योंकि यह प्रजनन अंगों में रक्त के संचार को बेहतर बनाता है। इससे एकाग्रता बढ़ती है और पीरियड्स के दौरान होने वाली चिड़चिड़ाहट में भी कमी आती है।
करने का सही तरीका और सावधानी
योग एक्सपर्ट्स की सलाह है कि इस आसन को सीधा करने के बजाय पहले कुछ दिन ‘कुक्कटासन’ का अभ्यास करना चाहिए, ताकि शरीर का संतुलन बेहतर हो सके।
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इसे करने के लिए सबसे पहले पद्मासन की मुद्रा में बैठें। इसके बाद अपने दोनों हाथों को जांघों और पिंडलियों के बीच की जगह से अंदर डालें और कोहनियों को बाहर निकालें। अब धीरे से कोहनियां मोड़ते हुए अपने दोनों कानों को पकड़ने का प्रयास करें। इस दौरान शरीर का पूरा भार कूल्हों पर होना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार 30 सेकंड से 1 मिनट तक इस स्थिति में रहें और फिर धीरे-धीरे सामान्य अवस्था में वापस आ जाएं।
संतुलित दृष्टिकोण
हालांकि यह योग महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है, लेकिन विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इसे हमेशा खाली पेट और किसी योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में ही शुरू करना चाहिए। यदि किसी को घुटने या रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्या हो, तो उन्हें डॉक्टरी सलाह के बिना यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।

