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World News: वेनेजुएला की राजनीति इन दिनों एक अजीब मोड़ पर खड़ी है। विपक्ष की मुखर और कड़े तेवरों वाली नेता मारिया कोरिना मचाडो को पिछले महीने नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया था। लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए उनके लंबे संघर्ष को दुनिया भले सराह रही हो, लेकिन उनके अपने ही देश में उन्हें आपराधिक मामलों में आरोपी बनाया गया है।
मचाडो की दिक्कत ये है कि अगर वो ओस्लो जाकर पुरस्कार लेना चाहें तो वेनेजुएला सरकार उन्हें “भगोड़ा” मानकर कार्रवाई कर सकती है। यानी नोबेल लेने की एक इच्छा, उनकी गिरफ्तारी का कारण बन सकती है।
सरकार बोली— विदेश गईं तो मानी जाएंगी फरार
वेनेजुएला के अटॉर्नी जनरल तारेक विलियम साब ने साफ शब्दों में कहा कि मचाडो पर कई गंभीर आपराधिक जांचें चल रही हैं। आरोप भी मामूली नहीं— षड्यंत्र, आतंकवाद से जुड़े कृत्य, और समाज में घृणा फैलाने जैसी धाराएँ लगी हैं।
सरकार का दावा है कि मचाडो पहले ही “छिपकर” रह रही हैं, इसलिए उन्हें विदेश यात्रा की इजाजत मिलना मुश्किल है। अगस्त 2024 में जब राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने खुद को तीसरी बार विजयी घोषित किया था, तभी से विपक्ष पर कार्रवाई तेज हुई और उसके तुरंत बाद मचाडो भूमिगत हो गईं।
पिछले महीने उन्होंने खुद बताया— ‘मुझे गायब कर देंगे’
मचाडो ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि उन पर आतंकवाद का आरोप लगाकर सरकार उन्हें ढूंढ रही है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा— “मेरे लगभग सभी साथी गिरफ्तार हो चुके हैं। जो बचे हैं वो या तो भागे हुए हैं या निर्वासन में।”
उनका कहना है कि पिछले साढ़े 15 महीनों से वह पूरी तरह अकेलेपन में जी रही हैं और डर इस बात का है कि जिस दिन सरकार उन्हें पकड़ लेगी, वह दिन शायद उनका आखिरी हो।
नॉर्वे जाने का फैसला उनके जीवन और राजनीति दोनों के लिए खतरा
मचाडो के समर्थकों में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या वह नोबेल लेने जाएंगी? अगर जाती हैं, तो वेनेजुएला में लौटते ही उन्हें भगोड़ा बताकर गिरफ्तारी तय है। अगर नहीं जातीं, तो दुनिया के सामने उनका संदेश कमजोर पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों का मानना है कि पुरस्कार को वर्चुअली लेने का विकल्प सबसे सुरक्षित रहेगा। इससे वे देश के भीतर रहकर लोकतांत्रिक आंदोलन का नेतृत्व जारी रख सकेंगी।
अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को लेकर भी चल रही जांच
मचाडो एक और विवाद के घेरे में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने कैरिबियन क्षेत्र में विमानवाहक पोत और युद्धपोत तैनात किए हैं, जिसे वाशिंगटन ने “ड्रग विरोधी अभियान” कहा है। लेकिन मादुरो सरकार का आरोप है कि यह वेनेजुएला की वामपंथी सरकार को गिराने की कोशिश है। मचाडो ने इस अमेरिकी सैन्य तैनाती का “समर्थन” किया था, जिसके बाद उनके खिलाफ और जांचें शुरू हो गईं। वेनेजुएला 2015 से अमेरिकी प्रतिबंध झेल रहा है, और हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है।
आगे क्या?
मचाडो की अगली चाल वेनेजुएला की राजनीति ही नहीं, बल्कि विपक्षी आंदोलनों के भविष्य को भी तय करेगी। क्या वह नोबेल लेने नॉर्वे जाएंगी? या फिर अपनी सुरक्षा को देखते हुए वर्चुअली ही पुरस्कार स्वीकार करेंगी? इन सवालों के जवाब पर दुनिया की नजरें टिक गई हैं।

