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Kyiv, (Ukraine): भाई साहब, वक्त बदलते देर नहीं लगती और आज की ये खबर इसका सबसे बड़ा सबूत है। दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क कहा जाने वाला अमेरिका, आज ईरान के सस्ते और घातक ड्रोनों के आगे बेबस नजर आ रहा है। आलम ये है कि अब अमेरिका को यूक्रेन के आगे मदद के लिए गुहार लगानी पड़ रही है। वाशिंगटन चाहता है कि यूक्रेन उसे वो तकनीक सिखाए जिससे ईरानी ‘शाहेद’ ड्रोनों को हवा में ही ढेर किया जा सके।
हैरानी की बात तो ये है कि करीब सात महीने पहले खुद यूक्रेन ने अमेरिका को ये ऑफर दिया था कि भाई, हमारी ये स्वदेशी तकनीक अपना लो, काम आएगी। लेकिन तब अमेरिका ने बड़े रूतबे में इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। अब जब ईरान के इन कम लागत वाले ड्रोनों ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया और सात अमेरिकी जवानों की जान चली गई, तब जाकर वाशिंगटन की नींद टूटी है। अब अमेरिकी अधिकारी दबी जुबान में मान रहे हैं कि यूक्रेन की बात न मानना एक बहुत बड़ी रणनीतिक गलती थी।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने खुद पुष्टि की है कि अब सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया के कई और देश भी उनसे हाथ मिलाने को बेताब हैं। जेलेंस्की ने जॉर्डन, कतर और बहरीन जैसे देशों के नेताओं से इस पर चर्चा भी की है। लेकिन भाई, जेलेंस्की भी अब कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। उन्होंने मदद के बदले एक साफ शर्त रख दी है। उनका कहना है कि वे तकनीकी मदद तभी देंगे जब इससे यूक्रेन की अपनी सुरक्षा पर आंच न आए और ये सहयोग रूस के खिलाफ जारी उनकी जंग को सही अंजाम तक पहुंचाने में मदद करे।
जेलेंस्की को इस बात की भी चिंता है कि ईरान और अमेरिका के इस नए झगड़े की वजह से दुनिया का ध्यान यूक्रेन-रूस युद्ध से हट गया है। इसी चक्कर में अमेरिका की मध्यस्थता में होने वाली शांति वार्ता भी फिलहाल टल गई है। कुल मिलाकर बात ये है कि आज के दौर में ड्रोन और उनसे बचने की तकनीक ही असली ताकत बन गई है, और इस मामले में फिलहाल यूक्रेन सबका गुरु बना बैठा है।
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