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तेहरान, (ईरान) | एजेंसी
ईरान और अमेरिका के बीच जारी महायुद्ध अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां तकनीक और ताकत के दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। अमेरिकी खुफिया विभाग की ताजा रिपोर्ट ने सनसनी फैला दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका द्वारा ईरान के 12,300 से ज्यादा ठिकानों पर भीषण हमले किए जाने के बावजूद ईरान का सैन्य जखीरा काफी हद तक सुरक्षित है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान के मिसाइल भंडारों को नेस्तनाबूद कर दिया गया है, लेकिन इंटेलिजेंस आकलन कहता है कि ईरान के पास अभी भी 50 फीसदी से ज्यादा मिसाइलें और कामिकाजे ड्रोन मौजूद हैं।
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खुफिया अधिकारियों के अनुसार, ईरान के कई मिसाइल भंडार ऐसे गुप्त स्थानों पर हैं जहां अमेरिकी बम पहुंच ही नहीं सके। कुछ ठिकानों पर हमले तो हुए हैं, लेकिन मिसाइलें मलबे के नीचे दबने के कारण अब भी सुरक्षित बताई जा रही हैं। सबसे बड़ी चिंता ईरान की तटीय क्रूज मिसाइलों को लेकर है, जो अमेरिकी बमबारी से पूरी तरह बच गई हैं। ये एंटी-शिप मिसाइलें ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से गुजरने वाले किसी भी जहाज को पल भर में डुबोने की क्षमता रखती हैं।
आर्थिक ठिकानों पर ईरान का ‘पलटवार’— ईरान अब रक्षात्मक मुद्रा से बाहर निकलकर आक्रामक हो गया है। तेहरान ने अब मिडिल ईस्ट में अमेरिका और इजराइल के आर्थिक और औद्योगिक केंद्रों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। ईरान ने दावा किया कि उसके औद्योगिक ठिकानों पर पहले हमले किए गए, जिसका वह अब करारा जवाब दे रहा है। ताजा हमलों में अबू धाबी स्थित अमेरिकी स्टील उद्योग, बहरीन में अमेरिकी एल्युमीनियम उद्योग और इजराइल की प्रमुख हथियार निर्माता कंपनी ‘रफायल’ की फैक्ट्री को भारी नुकसान पहुंचाया गया है।
ट्रंप की धमकियां और ‘वॉर क्राइम’ का सवाल— युद्ध के बीच राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों ने दुनिया भर के विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर ईरान समझौते पर नहीं आता, तो उसके हर एक पावर प्लांट और तेल के कुओं को तबाह कर दिया जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि 9 करोड़ की आबादी वाले देश के बिजली ग्रिड को निशाना बनाना और उसे ‘पाषाण युग’ में धकेलने की बात करना सीधे तौर पर ‘वॉर क्राइम’ (युद्ध अपराध) की श्रेणी में आता है। जिनेवा कन्वेंशन के तहत नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमला करना प्रतिबंधित है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यह हताशा इस बात का संकेत है कि अमेरिकी सेना को निकट भविष्य में ईरान में कोई बड़ी जीत मिलती नहीं दिख रही है। 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान भी तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने वाली इराकी सेना की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी निंदा हुई थी। आज वही इतिहास दोहराया जा रहा है, जहां अमेरिका सभ्यता के पैमाने पर ‘बर्बर युग’ की ओर बढ़ता दिख रहा है।

