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India News: देश की सबसे बड़ी अदालत ने संपत्ति के उत्तराधिकार और वसीयत की स्वतंत्रता को लेकर एक ऐसा फैसला सुनाया है जो कानूनी गलियारों से लेकर आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि संपत्ति का मालिक (टेस्टेटर) अपनी मेहनत की कमाई किसे देना चाहता है और किसे नहीं, यह पूरी तरह उसकी इच्छा पर निर्भर है। कोर्ट ने कहा कि हम पिता की इच्छा की जगह अपनी राय नहीं थोप सकते।
केरल का 35 साल पुराना विवाद: क्या था पूरा मामला?
यह मामला केरल के रहने वाले एनएस श्रीधरन का है। श्रीधरन के कुल नौ बच्चे थे, लेकिन उन्होंने 1988 में एक रजिस्टर्ड वसीयत बनाई। इस वसीयत में उन्होंने अपनी बेटी शैला जोसेफ को संपत्ति से पूरी तरह बेदखल कर दिया, जबकि बाकी आठ बच्चों में संपत्ति बांट दी। पिता की नाराजगी की वजह यह थी कि शैला ने समुदाय (धर्म) से बाहर जाकर शादी की थी। 1990 में श्रीधरन की मौत के बाद यह मामला अदालतों में उलझ गया।
निचली अदालतों के फैसले पलटे: ‘इच्छा’ सर्वोपरि है
शुरुआत में ट्रायल कोर्ट और केरल हाईकोर्ट ने शैला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि संपत्ति सभी नौ बच्चों में बराबर बंटनी चाहिए। लेकिन जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने इन फैसलों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब वसीयत कानूनी रूप से वैध और रजिस्टर्ड है, तो उसमें लैंगिक समानता या सामाजिक न्याय के आधार पर बदलाव नहीं किया जा सकता।
बेंच की सख्त टिप्पणी: हम खुद को पिता की जगह नहीं रख सकते
सुनवाई के दौरान शैला के वकील ने दलील दी कि उन्हें कम से कम संपत्ति का नौवां हिस्सा (1/9) मिलना चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति के बंटवारे में जब व्यक्ति की अंतिम इच्छा सामने हो, तो वहां ‘समानता’ का सवाल ही नहीं उठता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पिता ने बेटी को वंचित करने की जो वजह बताई है (अंतर्जातीय विवाह), उसकी स्वीकार्यता हमारे लिए मायने नहीं रखती। कानून की नजर में पिता की अंतिम वसीयत ही अंतिम सत्य है। इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने शैला के बंटवारे के दावे को खारिज कर दिया और भाइयों के पक्ष में संपत्ति को बहाल रखा।

