India News: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करते हुए बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि तलाक के बाद महिला को निकाह के समय मायके से लाया गया सामान, सोना–चांदी, नकदी और रिश्तेदारों व दोस्तों से मिले सभी उपहार वापस लेने का पूरा कानूनी अधिकार है। इसे महिला की निजी संपत्ति माना जाएगा और पति पर इसे लौटाने की बाध्यता होगी।
धारा 3 की नई व्याख्या—केवल सिविल विवाद नहीं, महिला की गरिमा जुड़ी है
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 को व्यापक रूप से लागू करने निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि इस धारा को “सिर्फ सिविल विवाद” न मानकर संविधान में दर्ज लैंगिक समानता, गरिमा और आर्थिक स्वायत्तता के नजरिए से देखा जाना चाहिए।
पीठ ने 2001 के डैनियल लतीफी मामले का हवाला देते हुए कहा कि इस कानून का उद्देश्य तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
पूर्व पति को 17.67 लाख रुपये लौटाने का आदेश
यह फैसला कोलकाता की एक महिला की याचिका पर आया, जिसने अपने पूर्व पति से निकाह में मिले सामान की वापसी और आर्थिक सहायता की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मांग को सही मानते हुए पूर्व पति को छह हफ्तों में 17,67,980 रुपये बैंक खाते में जमा करने का आदेश दिया।
हाई कोर्ट का फैसला उलटा—“संवैधानिक मूल्यों को नजरअंदाज़ किया गया”
सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के 2022 के फैसले की कड़ी आलोचना की, जिसमें महिला की याचिका खारिज कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने मामले को महज सिविल विवाद की तरह देखा और निकाहनामे के सबूतों की गलत व्याख्या कर दी, जबकि कानून का मकसद सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है।
देशभर की मुस्लिम महिलाओं के लिए राहत
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला देशभर में लाखों तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ी राहत है। अब वे न सिर्फ मेहर और गुजारा भत्ता, बल्कि निकाह में मिला हर सामान वापस पा सकती हैं।



