Jharkhand News: झारखंड की धरती को भगवान शिव की तपोभूमि कहा जाता है। यहां की घाटियाँ, जंगल, और नदियाँ भोलेनाथ की उपस्थिति से गुंजायमान मानी जाती हैं। इसी कड़ी में मुरहू प्रखंड के तपिंगसरा गांव में स्थित सूमीदान सरना मठ एक ऐसा ही धार्मिक स्थल है, जो न केवल आदिवासी समाज बल्कि गैर-आदिवासी श्रद्धालुओं की भी गहरी आस्था का केंद्र बन गया है।

शिव-पार्वती के अर्धनारीश्वर रूप में होती है पूजा

यह मठ खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम की सीमा पर स्थित है, जो घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसा है। मान्यता है कि यहां भगवान शिव और माता पार्वती अर्धनारीश्वर रूप में स्वयंभू रूप से विराजमान हैं। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार और साल भर के मंगलवार को यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।

सपनों में मिले संकेत से हुआ शिवलिंग का प्रकट होना

गांव के बुजुर्गों के अनुसार, यह स्थान वर्ष 1963-64 में चर्चा में आया, जब पतरस नामक ग्रामीण को शिवजी ने सपने में दर्शन दिए और एक स्थान पर खुदाई करने का निर्देश दिया। जब वहां खुदाई की गई तो एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ। तभी से यहां पूजा-अर्चना प्रारंभ हुई और यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए पवित्र धाम बन गया।

चमत्कारी साधना और तप का केंद्र

स्थानीय श्रद्धालु बताते हैं कि दिवंगत बिरसिंग मुंडारी को यहां शिव के दर्शन होते थे और उन्हें स्वप्न में निर्देश मिलते थे। इन दिव्य अनुभवों के चलते उन्होंने पहले सात दिन, फिर 21 दिन का उपवास रखा और 108 दिनों तक शिवलिंग पर जलाभिषेक किया। उनका पूरा जीवन भक्ति और साधना में बीता।

सरना और सनातन परंपरा का संगम स्थल

सूमीदान मठ न केवल आदिवासी समुदाय की सरना आस्था का केंद्र है, बल्कि यह सनातन धर्म के मूल्यों का भी प्रतीक है। यह धार्मिक स्थल एक ऐसा संगम है, जहां आदिवासी संस्कृति और हिंदू धार्मिक भावनाएं एक साथ बहती हैं।

यहां पहुंचने का रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था हर बाधा को पार कर देती है।

हर श्रद्धालु को मिलती है आत्मिक शांति

गांव के लोग मानते हैं कि इस मठ से उन्हें सुरक्षा और शुभ संकेत मिलते हैं। यहां पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं, और जीवन में सुख-शांति आती है।

इस स्थान की खासियत यह है कि यहां न केवल पूजा होती है, बल्कि यह क्षेत्रीय सांस्कृतिक चेतना और एकता का भी प्रतीक बन गया है।

Share.
Exit mobile version