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Health News: जनवरी की कड़ाके की ठंड और माघ का पवित्र महीना; इन दोनों का एक गहरा संबंध ‘तिल’ से है। भारत में मकर संक्रांति, तिल द्वादशी और गणेश चौथ जैसे त्योहारों का आना इस बात का संकेत है कि अब हमारे शरीर और आत्मा को तिल की गर्माहट की जरूरत है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे पूर्वजों ने माघ में ही तिल के दान और सेवन पर इतना जोर क्यों दिया? दरअसल, इसके पीछे धर्म और आयुर्वेद का एक सटीक गणित छिपा है।
धर्म और परंपरा: तिल के 6 चमत्कारी उपयोग
हिंदू धर्म शास्त्रों में माघ मास के दौरान तिल का छह प्रकार से उपयोग करने का विधान बताया गया है। इसमें तिल के पानी से स्नान, शरीर पर उबटन की तरह लेप, हवन में आहुति, जरूरतमंदों को दान, फलाहार के रूप में सेवन और पितरों को तिल-जल से तर्पण शामिल है। हां, मान्यता तो यहाँ तक है कि अगर आप पवित्र नदी में स्नान नहीं कर पा रहे हैं, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़े तिल मिला लेने से संक्रांति का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
आयुर्वेद का नजरिया: रोगों का काल है तिल
आयुर्वेद के अनुसार, माघ की ठंड शरीर में ‘वात दोष’ बढ़ाती है, जिससे जोड़ों में दर्द, त्वचा में सूखापन और थकान महसूस होती है। तिल की तासीर गर्म और तैलीय होती है, जो शरीर के भीतर अग्नि प्रज्वलित रखती है। आयुर्वेदाचार्य इसे ‘सर्वदोष हारा’ कहते हैं, क्योंकि यह कफ और वात को संतुलित कर हड्डियों को फौलाद जैसी मजबूती देता है। इसमें मौजूद कैल्शियम, आयरन और विटामिन-ई बुढ़ापे की रफ्तार को धीमा करते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं।
हड्डियों से लेकर बालों तक का रक्षक
सिर्फ खाने में ही नहीं, तिल के तेल की मालिश भी माघ में वरदान मानी गई है। यह कब्ज को दूर करता है, पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है और दांतों व बालों को पोषण देता है। तो इस माघ मास में केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि एक स्वस्थ जीवन के लिए तिल को अपनी दिनचर्या का हिस्सा जरूर बनाएं। आखिर धर्म और विज्ञान दोनों ही इसके गुणों के आगे नतमस्तक हैं।
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