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Home»States»Jharkhand»करनडीह में गूंजा ‘जोहार’: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली गीत गाकर जीता सबका दिल!
Jharkhand

करनडीह में गूंजा ‘जोहार’: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली गीत गाकर जीता सबका दिल!

करनडीह में ओलचिकी शताब्दी समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली गीत और संबोधन से इतिहास रच दिया। उन्होंने मातृभाषा में कानूनी शिक्षा पर जोर दिया।
By Samsul HaqueDecember 29, 20254 Mins Read
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Jamshedpur News: परसुडीह के करनडीह स्थित दिशोम जाहेरथान प्रांगण सोमवार को संताली समाज के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया, जब ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन और दिशोम जाहेरथान कमेटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 22वें संताली परसी माहा एवं ओलचिकी शताब्दी समारोह में देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली भाषा में संबोधन किया। राष्ट्रपति के संताली गीत और भावनात्मक वक्तव्य ने न केवल उपस्थित जनसमूह को भावविभोर किया, बल्कि आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति और अस्मिता को राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से स्थापित किया।

जमशेदपुर में इतिहास का साक्षी बना करनडीह, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संताली संबोधन से ओलचिकी शताब्दी समारोह हुआ गौरवमय

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन की शुरुआत संताली नेहोर गीत “जोहार जोहार आयो…” से की, जिसे उन्होंने लगभग तीन मिनट तक गाया। गीत के साथ ही पूरा प्रांगण तालियों और भावनाओं से गूंज उठा। राष्ट्रपति ने कहा कि करनडीह आने से पहले उन्होंने जाहेर आयो को नमन किया और गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने अपने जीवन संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज के लोगों का प्रेम और इष्टदेवों का आशीर्वाद ही उन्हें इस मुकाम तक लेकर आया है।

इस खबर को भी पढ़ें : करनडीह में इतिहास रचा गया: ओलचिकी के आंगन में महामहिम का भव्य स्वागत!

राष्ट्रपति ने ओलचिकी लिपि को संताली समाज की पहचान, आत्मसम्मान और एकता का मजबूत आधार बताया। उन्होंने ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि यह संगठन वर्षों से आदिवासी स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। राष्ट्रपति ने संविधान के संताली (ओलचिकी) अनुवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि जब कानून और अधिकारों की जानकारी मातृभाषा में होती है, तब समाज सशक्त बनता है और अज्ञानवश निर्दोष लोगों को सजा से बचाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि संताली भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है, इसलिए देश को चलाने वाले नियम और कानून की जानकारी भी संताली समाज को अपनी भाषा में मिलनी चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि कानून की जानकारी के अभाव में कई निर्दोष लोग जेल तक पहुंचे हैं। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में संताल समाज के लोग रहते हैं और शिक्षित युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, ऐसे में अपने अधिकारों, भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी समाज के युवाओं की है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे ओलचिकी लिपि और संताली समाज के संरक्षण व विकास के लिए लगातार प्रयास करती रहेंगी।

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समारोह को संबोधित करते हुए झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने कहा कि यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति की जीवंतता और गौरव का प्रतीक है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जीवन संघर्ष को पूरे आदिवासी समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताया और कहा कि जमशेदपुर सांप्रदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक शहर है। राज्यपाल ने याद दिलाया कि वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था और ओलचिकी लिपि हमारी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल भवन जनजातीय भाषाओं और संस्कृतियों के संरक्षण के लिए सदैव तत्पर रहेगा।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के विकास में योगदान ऐतिहासिक है। उन्होंने संविधान के संताली अनुवाद को समाज के लिए मील का पत्थर बताते हुए कहा कि गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू ने संताली समाज को लिपि देकर जो पहचान दी, उसके लिए पूरा समाज उनका ऋणी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार भी जनजातीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है।

इस खबर को भी पढ़ें : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का 3 दिवसीय झारखंड दौरा; रांची हाई अलर्ट पर, सुरक्षा ब्रीफिंग पूरी

स्वागत भाषण में टीएसएफ के जीरेन टोपनो ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि झारखंड की स्कूली शिक्षा में सभी क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल किया जाए और ओलचिकी लिपि में पढ़ाई की समुचित व्यवस्था की जाए, ताकि बच्चे अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ सकें।

समारोह के समापन अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली साहित्य और ओलचिकी लिपि को समृद्ध करने वाले साहित्यकारों, शिक्षकों और साधकों को सम्मानित किया। सम्मानित होने वालों में शोभनाथ बेसरा, पद्मश्री डॉ. दमयंती बेसरा, मुचीराम हेम्ब्रॉम, भीमवार मुर्मू, साखी मुर्मू, रामदास मुर्मू, चुंडा सोरेन सिपाही, छोतराय बास्के, निरंजन हंसदा, बी.बी. सुंदरमन, सौरव, शिव शंकर कंडेयांग, सी.आर. माझी सहित कई अन्य नाम शामिल रहे।

करनडीह में आयोजित ओलचिकी शताब्दी समारोह संताली समाज की सांस्कृतिक चेतना, भाषा गौरव और एकता का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आया, जिसने आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और अपनी पहचान पर गर्व करने का मजबूत संदेश दिया।

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