Ranchi News: झारखंड की राजनीति में इन दिनों ‘PESA’ (पेसा) कानून सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बना हुआ है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा इस कानून की नियमावली को धरातल पर उतारने की दिशा में उठाए गए कदमों के बाद जहां एक ओर उन्हें बधाइयां मिल रही हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भारी कौतूहल और बहस छिड़ गई है। आदिवासियों के अधिकारों और ‘स्वशासन’ से जुड़ा यह कानून राज्य की सामाजिक और आर्थिक दिशा बदलने की क्षमता रखता है।

झारखंड की फिजाओं में इन दिनों एक ही नाम गूंज रहा है— ‘पेसा’ (PESA)। मुख्यमंत्री को बधाइयां मिल रही हैं, तो विपक्ष और नौकरशाही में सुगबुगाहट है। आखिर क्या है यह कानून जो गांव के आम आदमी को ‘कलेक्टर’ से भी ज्यादा पावरफुल बनाने का दावा करता है? आइए, इस उलझी हुई गुत्थी को आसान शब्दों में समझते हैं।

क्या है PESA कानून? (Panchayats Extension to Scheduled Areas)

PESA का पूरा नाम ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996’ है। 24 दिसंबर 1996 को संसद द्वारा पारित यह कानून संविधान की 5वीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले आदिवासी क्षेत्रों को विशेष अधिकार देता है। झारखंड के 24 में से 13 जिले पूर्णतः और 3 जिले आंशिक रूप से इसके दायरे में आते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, PESA कानून ग्राम सभाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें अपने संसाधनों पर नियंत्रण रखने की असली शक्ति देता है। यह पारंपरिक ग्राम शासन प्रणाली को संवैधानिक मान्यता प्रदान करता है।

PESA के प्रमुख प्रावधान और ग्राम सभा की ‘सुपर’ शक्तियां

  • संसाधनों पर पूर्ण अधिकार: लघु वनोपज (जैसे तेंदू पत्ता, महुआ), जल निकायों और गौण खनिजों पर अब ग्राम सभा का मालिकाना हक होगा।

  • भूमि अधिग्रहण पर अंकुश: किसी भी विकास परियोजना (खदान, बांध या उद्योग) के लिए भूमि अधिग्रहण से पहले संबंधित ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य होगी।

  • सांस्कृतिक पहचान का कवच: आदिवासियों की रूढ़िवादी परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण का अधिकार अब ग्राम सभा के पास सुरक्षित रहेगा।

  • स्थानीय न्याय व्यवस्था: छोटे-मोटे विवादों के लिए अब थाना-पुलिस के चक्कर नहीं लगाने होंगे; ग्राम सभा को अपने स्तर पर विवाद सुलझाने की स्वायत्तता मिलेगी।

झारखंड में कौतूहल और विवाद की असल वजह

झारखंड गठन के 25वें वर्ष में प्रवेश करने के बावजूद PESA का पूर्ण प्रभावी न होना सबसे बड़ा सवाल रहा है।

  1. नियमावली (Rules) का पेंच: केंद्र ने 1996 में कानून तो बनाया, लेकिन राज्यों को अपनी ‘नियमावली’ बनाने की छूट दी। झारखंड में दशकों तक यह प्रक्रिया ठंडे बस्ते में रही, जिसे अब वर्तमान सरकार ने गति दी है।

  2. सत्ता का विकेंद्रीकरण: PESA लागू होने का सीधा मतलब है कि ‘कलेक्टर’ या ‘अधिकारी’ राज की शक्तियां कम होंगी और ग्राम सभा सर्वोपरि होगी। इसी शक्ति के हस्तांतरण को लेकर नौकरशाही और उद्योग जगत में बेचैनी है।

  3. पत्थलगड़ी आंदोलन का साया: राज्य में हुए पत्थलगड़ी आंदोलन ने PESA की चर्चा को घर-घर पहुंचाया। हालांकि प्रशासन ने इसे चुनौती माना, लेकिन इसने आदिवासियों को उनके संवैधानिक हक के प्रति जागरूक कर दिया।

कानून लागू होने के 3 बड़े क्रांतिकारी प्रभाव

  • विस्थापन पर रोक: जबरन भूमि अधिग्रहण अब बीते दिनों की बात हो जाएगी, जिससे आदिवासियों का अपनी जमीन से उजड़ना रुकेगा।

  • नक्सलवाद की जड़ों पर प्रहार: विशेषज्ञों का मानना है कि जब ग्रामीणों को अपने जल-जंगल-जमीन पर निर्णय लेने का अधिकार मिलेगा, तो व्यवस्था के प्रति असंतोष खत्म होगा, जो अक्सर उग्रवाद का कारण बनता है।

  • आर्थिक स्वावलंबन: वनोपजों के व्यापार का मुनाफा बिचौलियों के बजाय सीधे ग्राम सभा और आदिवासियों के खातों में जाएगा।

झारखंड में PESA कानून केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि ‘अबुआ दिशुम-अबुआ राज’ (हमारा देश-हमारा राज) के सपने को साकार करने की चाबी है। जनता अब अपने अधिकारों के प्रति सजग है। चुनौती अब सरकार के सामने है कि वह औद्योगिक विकास और आदिवासी स्वायत्तता के बीच एक मजबूत सेतु कैसे तैयार करती है।

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