India News: पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर मतुआ समुदाय की वजह से सुलग उठी है। बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के चलते आए ये हिंदू शरणार्थी दशकों से भारतीय नागरिकता की मांग कर रहे हैं। बीजेपी ने इन्हें CAA के तहत नागरिकता देने का वादा किया था, और इसी उम्मीद में मतुआ लोगों ने पार्टी को भरपूर समर्थन भी दिया। लेकिन अब वही समुदाय एक नई परेशानी में घिर गया है- SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया।

SIR में नाम न मिलने का डर- क्यों बढ़ रही दहशत?

कई मतुआ परिवारों के पास आधार, पैन और वोटर कार्ड जैसे भारतीय दस्तावेज हैं, लेकिन उनका डर यह है कि वे अपनी पारिवारिक कड़ियां साबित नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उनकी जड़ें बांग्लादेश में हैं। वोटर लिस्ट में दोबारा नाम दर्ज कराने के लिए उन्हें “भारतीय नागरिक” साबित करना होगा, लेकिन CAA में आवेदन करते समय उन्हें खुद को “बांग्लादेशी विदेशी” बताना पड़ता है। इससे नागरिकता मिलने तक उनकी कानूनी स्थिति अधर में लटक जाती है- यही उनकी सबसे बड़ी चिंता है।

राजनीतिक दबाव- शांतनु ठाकुर ने शुरू किए CAA आवेदन केंद्र

मतुआ समुदाय के सबसे बड़े नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री शांतनु ठाकुर बढ़ती बेचैनी के बीच सक्रिय हो गए हैं। उनके निर्देश पर कई जगहों पर CAA आवेदन केंद्र शुरू कर दिए गए हैं, जहां ऑल इंडिया मतुआ महासंघ प्रमाण पत्र जारी कर रहा है। लेकिन इन्हीं प्रमाण पत्रों की कानूनी वैधता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। क्या कोई केंद्रीय मंत्री ऐसे दस्तावेज जारी कर सकता है? क्या यह कानूनन मान्य है?

ममता बनर्जी का पलटवार- ‘ये 100 रुपए लेकर हिंदुत्व कार्ड बांट रहे हैं’

ममता बनर्जी ने बोंगांव की रैली में इसे बीजेपी द्वारा “राजनीतिक शोषण” करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि CAA के नाम पर मतुआ समुदाय को डराया जा रहा है और वोटर लिस्ट से नाम कटने की अफवाहें फैलाई जा रही हैं। टीएमसी का दावा है कि SIR को चुनिंदा क्षेत्रों में दबाव के साथ लागू किया जा रहा है।

समय कम, चिंता ज्यादा- SIR की अंतिम तारीख 4 दिसंबर

स्थिति इसलिए और तनावपूर्ण है क्योंकि SIR फॉर्म जमा करने की अंतिम तारीख नजदीक आ चुकी है। लाखों मतुआ लोग दो पाटों के बीच फंसे हैं- एक तरफ नागरिकता का वादा, दूसरी तरफ वोटर लिस्ट से बाहर हो जाने का डर। केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा है कि वह नागरिकता प्रक्रिया को तेज करे। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इतने कम समय में लाखों आवेदनों को पूरा करना व्यावहारिक रूप से लगभग असंभव है।

यह सिर्फ नागरिकता नहीं- पूरे बंगाल की राजनीति का बड़ा मुद्दा

अब यह मामला मानवीय संकट से बढ़कर बंगाल की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है। आने वाले कुछ हफ्तों में इसका असर सीधे 2026 की चुनावी हवा पर पड़ेगा।

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