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Koderma News: संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना के लिए माताएं जिस व्रत का सालभर इंतजार करती हैं, वह जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया इस बार 14 सितंबर को मनाया जाएगा। पंडित जीवकांत झा ने बताया कि मिथिला पंचांग के अनुसार, 13 सितंबर को षष्ठी तिथि का समापन होने के बाद सुबह 11:15 बजे से सप्तमी तिथि का प्रवेश होगा। इस दिन व्रती माताएं रातभर ओठगन पूजन कर विशेष भोजन करेंगी। इसके बाद 14 सितंबर को सूर्योदय काल से प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि रहने के कारण महिलाएं निराहार और निर्जला उपवास करेंगी। व्रत का पारण 15 सितंबर की सुबह 6:36 बजे किया जाएगा।
यह व्रत सनातन धर्म में मातृत्व की महानता और त्याग का प्रतीक माना जाता है। कहा भी गया है कि “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवित”—पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन मां कभी कुमाता नहीं होती। यही संदेश चरितार्थ करता है जितिया व्रत। इस व्रत में महिलाएं अपनी संतान की रक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए कठोर तप करती हैं। खास बात यह है कि इस दौरान व्रती महिलाएं न केवल अन्न का त्याग करती हैं, बल्कि एक बूंद पानी तक ग्रहण नहीं करतीं।
पंडित झा के अनुसार, यह परंपरा सतयुग से चली आ रही है। मां का यह कठिन तप संतान के लिए ही संभव है। इस व्रत के दौरान व्रती माताएं एक विशेष डाला सजाती हैं। इसमें कुशी मटर, मिठाई, बांस, बेल, जील और झिंगली के पत्ते रखकर मान के पत्ते से ढक दिया जाता है। मान्यता है कि डाले में रखा बांस वंश का प्रतीक, जील जीवन का प्रतीक और बेल सिर का प्रतीक माना जाता है।
जितिया व्रत में राजा शालिवाहन के पुत्र जीमूतवाहन की पूजा की जाती है, जिन्होंने पक्षियों के प्राण बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। इसीलिए यह व्रत त्याग और बलिदान का प्रतीक भी है।
अभ्रकनगरी कोडरमा सहित पूरे प्रदेश में इस व्रत को लेकर माताओं में गहरी आस्था और श्रद्धा देखी जाती है। चाहे गांव हो या शहर, हर जगह महिलाएं संतान की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए पूरे नियम और विधि-विधान से इस व्रत का पालन करती हैं। माना जाता है कि इस कठिन तप से मां की प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती और संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है।

