Bihar News: बिहार विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी पर हुई है, तो वह प्रशांत किशोर और उनकी जनसुराज पार्टी है। चुनाव से पहले PK ने दावा किया था कि वे राज्य की राजनीति में नया मॉडल पेश करेंगे और सरकार बनाने तक की बात कही थी। इसके लिए उन्होंने 243 में से 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे। लेकिन असली तस्वीर कुछ और ही निकली।

नतीजा यह रहा कि 238 में से 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। कई राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह नतीजा किसी झटके से कम नहीं था, क्योंकि PK के अभियान को काफी समर्थन मिल रहा था।

“35 सीटों पर बदला खेल, लेकिन जनसुराज कुछ न कर सकी”

चौंकाने वाली बात यह है कि PK की पार्टी सीधे तौर पर हार-जीत भले न प्रभावित कर सकी हो, लेकिन 35 सीटों पर उनके उम्मीदवारों ने ऐसे वोट हासिल किए, जो जीत-हार के अंतर से ज्यादा थे। यानी अगर ये उम्मीदवार न होते तो नतीजे कई जगह बिल्कुल अलग दिखते। इन 35 में से 19 सीटें एनडीए के खाते में गईं, जबकि 14 सीटें महागठबंधन को मिलीं। इसके अलावा AIMIM और BSP ने एक-एक सीट जीती।

इन सीटों पर जनसुराज तीसरे नंबर पर रही और एक जगह तो दूसरे स्थान पर भी। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह कहना मुश्किल है कि अगर PK मैदान में नहीं होते तो उनके वोट कहां जाते। लेकिन इतना जरूर है कि उन्होंने वोटों को विभाजित किया और इसका सीधा असर कई सीटों पर दिखा।

इसी बीच जनसुराज के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय सिंह ने दावा किया है कि उनके मतदाता अंतिम समय में “जंगलराज” की आशंका के चलते एनडीए की तरफ चले गए। उन्होंने यहां तक आरोप लगाया कि एनडीए की सरकार ने चुनाव से पहले जनता पर 40 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए और यह जीत “खरीदी हुई” है।

इन नतीजों के बाद यह साफ हो गया कि PK जनता के बीच माहौल तो बना पाए, लेकिन उसे वोट में बदलने में नाकाम रहे। बिहार की राजनीति में उनकी एंट्री जितनी शोर के साथ हुई थी, नतीजे उतने ही शांत और सवालों से भरे निकले।

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