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Chennai: चेन्नई एयरपोर्ट से महज 50 किलोमीटर दूर ओरागडम के स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) में एक ऐसी फैक्ट्री स्थित है, जो भविष्य के भारत की झलक दिखाती है। इस इकाई में न तो इंसानी मजदूरों का शोर है और न ही रोशनी की चकाचौंध। इसे ‘डार्क फैक्ट्री’ कहा जाता है, क्योंकि यहां काम करने वाले 57 रोबोटिक मशीनों को देखने के लिए रोशनी की आवश्यकता नहीं होती। यह भारत की पहली और दुनिया की तीसरी ऐसी फैक्ट्री है जो पूरी तरह स्वचालित (Autonomous) है।
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अभूतपूर्व कार्यक्षमता और सटीकता- पॉलिमेटिक की इस इकाई में 125 करोड़ रुपये की लागत से रोबोटिक आर्म्स लगाए गए हैं। इसकी कुछ चौंकाने वाली विशेषताएं इस प्रकार हैं:
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न्यूनतम ब्रेक: ये मशीनें साल के 365 दिन, 24 घंटे काम करती हैं। पूरे साल में इन्हें केवल 30 मिनट का मेंटेनेंस ब्रेक दिया जाता है।
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शून्य प्रदूषण: फैक्ट्री के भीतर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 002 दर्ज किया गया है, जो दुनिया के सबसे शुद्ध वातावरण में से एक है। यह सेमीकंडक्टर चिप्स और पीसीबी असेंबली जैसे संवेदनशील कार्यों के लिए अनिवार्य है।
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इंसानी भूमिका: पूरी फैक्ट्री की निगरानी के लिए गार्ड समेत केवल 6 लोग तैनात हैं। इनमें 2 तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं जो केवल सिस्टम की प्रोग्रामिंग देखते हैं।
350 बनाम 57: रोजगार पर बहस- कंपनी के डायरेक्टर विशाल नंदन के अनुसार, जो काम 350 कुशल कर्मचारी मिलकर करते हैं, उसे ये 57 रोबोट कहीं अधिक सटीकता के साथ पूरा कर रहे हैं। यहां रोबोट इंसानों की तरह शिफ्ट में काम नहीं करते, बल्कि उनकी प्रोग्रामिंग ही ऐसी है कि वे 25 वर्षों तक लगातार सेवा दे सकें।
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क्या है डार्क फैक्ट्री का कॉन्सेप्ट?- ‘डार्क फैक्ट्री’ का मतलब ऐसी निर्माण इकाई से है जिसे चलाने के लिए इंसानी मौजूदगी की जरूरत नहीं होती, इसलिए वहां बिजली बचाने के लिए अंधेरा रखा जा सकता है। दुनिया की पहली ऐसी फैक्ट्री 2001 में जापान की फेनक (Fanuc) ने बनाई थी। भारत में इस मॉडल का आना विनिर्माण (Manufacturing) के क्षेत्र में एक बड़े तकनीकी बदलाव का संकेत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल उत्पादन लागत को कम करने और वैश्विक गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में क्रांतिकारी साबित होगा, हालांकि इससे पारंपरिक नौकरियों के भविष्य पर सवाल भी उठ रहे हैं।

