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नई दिल्ली — पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच भड़के भीषण सैन्य संघर्ष ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है। युद्ध की विभीषिका के कारण तेल और गैस की किल्लत का साया अब भारतीय सरहदों के भीतर भी महसूस किया जाने लगा है, जिससे विशेष रूप से एलपीजी (रसोई गैस) की निर्बाध आपूर्ति पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हालांकि, भारतीय उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि केंद्र की मोदी सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए तत्काल ‘एक्शन मोड’ में आ गई है। सरकार ने न केवल घरेलू स्तर पर गैस उत्पादन बढ़ाने के कड़े निर्देश जारी किए हैं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए अपने ‘प्लान-बी’ को भी पूरी ताकत के साथ धरातल पर उतार दिया है।
रणनीतिक विविविधीकरण (Strategic Diversification) के तहत भारत ने अब उन रास्तों को टटोलना शुरू कर दिया है, जो युद्ध की आंच से दूर हैं। इसी कड़ी में अल्जीरिया, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और नॉर्वे जैसे देशों से एलएनजी और एलपीजी की अतिरिक्त खेपें मंगवाई जा रही हैं, जो जल्द ही भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने वाली हैं।
घरेलू तेल कंपनियों ने झोंकी ताकत — वैश्विक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही ठप होने की आशंकाओं के बीच, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज तेल कंपनियों—आईओसीएल (IOCL), बीपीसीएल (BPCL) और एचपीसीएल (HPCL)—ने अपनी रिफाइनरियों में एलपीजी के घरेलू उत्पादन में तत्काल 10 प्रतिशत तक की भारी वृद्धि कर दी है। सरकार की प्राथमिकता पूरी तरह स्पष्ट है: चाहे कुछ भी हो जाए, कमर्शियल उपयोग के बजाय आम नागरिक की रसोई तक पहुंचने वाली गैस में कोई कटौती नहीं होनी चाहिए।
जमाखोरी रोकने के लिए सख्त पहरा — आपूर्ति में किसी भी तरह की सेंधमारी या कालाबाजारी को रोकने के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय ने तीन कार्यकारी निदेशकों (Executive Directors) की एक उच्च स्तरीय विशेष समिति का गठन किया है। यह समिति हर छोटे-बड़े गैस वितरण केंद्र की निरंतर निगरानी कर रही है ताकि गैर-जरूरी व्यवसायों या बिचौलियों द्वारा गैस की जमाखोरी को सख्ती से रोका जा सके। सरकार ने स्पष्ट किया है कि कमर्शियल गैस सिलेंडरों के उपयोग पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी ताकि घरेलू कोटा सुरक्षित रहे।
आयात के आंकड़ों का गणित और नई रणनीति — अगर हम भारत की गैस जरूरतों पर नजर डालें, तो एलएनजी की सोर्सिंग में कतर 42.22 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ आज भी सबसे बड़ा खिलाड़ी है, जिसके बाद अमेरिका (18.5 प्रतिशत) और यूएई (11.11 प्रतिशत) का नंबर आता है। एलपीजी के मामले में भारत की निर्भरता खाड़ी देशों पर और भी ज्यादा है, जहां यूएई और कतर मिलकर 62 प्रतिशत से अधिक की आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं। वर्तमान युद्ध और ट्रंप टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच भारत का यह रणनीतिक कदम एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर रहा है। सरकार के इन कड़े फैसलों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक सक्रियता का एकमात्र उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक की थाली को युद्ध की तपिश से बचाना है।
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