World News: मध्य पूर्व एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। ईरान और इजरायल के बीच हाल के दिनों में बढ़ा तनाव अब सीधे सैन्य संघर्ष की ओर बढ़ता दिख रहा है। दोनों देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है।

हाल ही में इजरायल ने सीरिया और गाजा में ईरान समर्थित संगठनों पर सैन्य कार्रवाई की, जिसके जवाब में ईरान ने चेतावनी दी कि वह सीधे जवाब देगा। इसके बाद ईरान ने इजरायल के कुछ रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की, जिससे हालात और बिगड़ गए।

अब यह टकराव सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मिसाइल हमले, ड्रोन हमले और साइबर अटैक की घटनाएं सामने आ रही हैं। अमेरिका की सक्रियता इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ी है, वहीं रूस और चीन ने संयम बरतने की अपील की है। भारत सहित दुनिया के कई देश इस संकट पर करीबी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है।

इतिहास की जड़ें: कैसे बना पर्शिया से ईरान

ईरान की जड़ें दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक पर्शियन साम्राज्य में हैं, जिसे 2500 साल पहले आचेमेनिड वंश ने स्थापित किया था। साइरस महान और दरियस प्रथम जैसे शासकों ने इस साम्राज्य को मध्य एशिया से लेकर यूनान और भारत तक फैलाया। यूनानियों ने इसे “फारस/पर्शिया” नाम दिया क्योंकि यह “पार्स” प्रांत से शासित होता था।

हालांकि देश के लोग अपने क्षेत्र को ईरान (आर्यों की भूमि) के नाम से जानते थे। 1935 में तत्कालीन शासक रेज़ा शाह पहलवी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने देश का नाम आधिकारिक रूप से “ईरान” रखने की घोषणा की, ताकि इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को दुनिया तक पहुंचाया जा सके।

इस्लाम का आगमन और सांस्कृतिक बदलाव

7वीं शताब्दी में अरबों ने जब पर्शियन साम्राज्य पर हमला किया, तब वहां जोरोअस्ट्रियन धर्म का वर्चस्व था। लेकिन 651 ईस्वी में ससानिद साम्राज्य के पतन के बाद इस्लाम धीरे-धीरे यहां फैलने लगा। शुरू में सुन्नी इस्लाम अपनाया गया, लेकिन 16वीं शताब्दी में सफवी वंश के दौर में शिया इस्लाम को आधिकारिक धर्म का दर्जा मिला।

कैसे बना ईरान एक इस्लामिक स्टेट?

20वीं सदी की शुरुआत में ईरान पश्चिमीकरण की राह पर चला। रेज़ा शाह पहलवी और उनके पुत्र मोहम्मद रेज़ा शाह ने आधुनिक संस्थाओं और पश्चिमी जीवनशैली को बढ़ावा दिया। लेकिन इससे परंपरावादी और धार्मिक वर्गों में असंतोष बढ़ने लगा।

1979 में आयतुल्ला रुहोल्ला खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई। शाह को देश छोड़ना पड़ा और ईरान में इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना हुई। इस प्रणाली में धार्मिक नेतृत्व सर्वोच्च होता है, जबकि संसद और राष्ट्रपति जैसी संस्थाएं भी कार्यरत रहती हैं, लेकिन अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सुप्रीम लीडर के पास होता है।

ईरान की वर्तमान सत्ता संरचना

आज ईरान में सबसे बड़ी सत्ता सुप्रीम लीडर के पास है, जो धार्मिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर अंतिम निर्णय लेते हैं। आयतुल्ला अली खामेनेई 1989 से इस पद पर आसीन हैं। इनके अधीन राष्ट्रपति, न्यायपालिका, संसद और सैन्य संस्थाएं कार्य करती हैं।

राष्ट्रपति जनता द्वारा चुना जाता है। 2025 तक ईब्राहिम रईसी राष्ट्रपति थे। हालांकि, विदेश नीति, रक्षा, और परमाणु कार्यक्रम जैसे संवेदनशील मसलों पर अंतिम मुहर सुप्रीम लीडर ही लगाते हैं।

क्या ईरान-इजरायल युद्ध होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द ही दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान नहीं निकाला गया, तो यह संघर्ष एक बड़े युद्ध में बदल सकता है। होर्मुज स्ट्रेट जैसी संवेदनशील जगहों पर तनाव का असर वैश्विक तेल व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर असर डाल सकता है।

ऐसे में यह केवल एक क्षेत्रीय टकराव नहीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता का कारण बन सकता है। दुनिया की नजर अब ईरान और इजरायल की अगली रणनीति पर टिकी है।

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