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Public Adda: बुराई पर अच्छाई की जीत और आपसी प्रेम का प्रतीक होली इस साल 4 मार्च को मनाई जाएगी। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, भारत का हर कोना इस समय रंगों के उल्लास में डूबा है। होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की लोक कथाओं और परंपराओं का संगम है।
ब्रज की विश्वप्रसिद्ध होली: 40 दिनों का उत्सव— उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र (मथुरा, वृंदावन, बरसाना) में होली सबसे जीवंत रूप में मनाई जाती है:
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लट्ठमार होली: बरसाना और नंदगांव की यह परंपरा श्रीकृष्ण और राधाजी के प्रेम का प्रतीक है, जहां महिलाएं हंसी-मजाक में पुरुषों पर लाठियां चलाती हैं।
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फूलों और लड्डू की होली: वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में पंखुड़ियों की वर्षा होती है, तो बरसाना के श्रीजी मंदिर में लड्डुओं की होली खेली जाती है।
काशी की मसान होली और अन्य राज्यों के रंग
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वाराणसी: यहां ‘मसान होली’ की अद्भुत परंपरा है, जहां भक्त बाबा विश्वनाथ के साथ चिता की भस्म से होली खेलते हैं।
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हरियाणा: यहां इसे ‘धुलंडी’ कहा जाता है, जहां भाभी-देवर की ठिठोली मुख्य आकर्षण होती है।
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महाराष्ट्र और गोवा: महाराष्ट्र में ‘रंग पंचमी’ तो गोवा में ‘शिग्मो’ उत्सव के रूप में झांकियां निकाली जाती हैं।
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दक्षिण भारत: केरल के कोंकणी समुदाय में ‘मंजल कुली’ मनाई जाती है, जिसमें हल्दी के पानी का उपयोग होता है।
शौर्य और लोकगीतों का संगम
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पंजाब: सिख समुदाय ‘होला मोहल्ला’ के रूप में इसे मनाता है, जिसमें तलवारबाजी और घुड़सवारी जैसे शौर्य प्रदर्शन होते हैं।
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उत्तराखंड: कुमाऊं में ‘बैठकी’ और ‘खड़ी होली’ शास्त्रीय रागों और लोकगीतों के साथ मनाई जाती है।
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पूर्वी भारत: पश्चिम बंगाल में ‘डोल जात्रा’, असम में ‘फाकुवा’ और मणिपुर में ‘याओसांग’ के नाम से छह दिनों तक जश्न चलता है।
ओडिशा में इसे ‘डोला पूर्णिमा’ और बिहार-झारखंड में ‘फगुआ’ के नाम से पुकारा जाता है। नाम भले अनेक हों, लेकिन सबका मकसद पुरानी कटुता भुलाकर प्रेम और सौहार्द को बढ़ाना है।

