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World News: त्रिनिदाद एंड टोबैगो की राजधानी पोर्ट ऑफ स्पेन आज दुनियाभर में एक सांस्कृतिक संगम के रूप में जाना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि स्पेन से करीब 6000 किलोमीटर दूर स्थित इस शहर का नाम ‘पोर्ट ऑफ स्पेन’ क्यों है? यह सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में छिपी एक दिलचस्प कहानी है, जो भारत से भी जुड़ी हुई है।
स्पैनिश राज और नाम की शुरुआत
दरअसल, ‘पोर्ट ऑफ स्पेन’ नाम स्पैनिश भाषा से लिया गया है। इस शहर का पुराना नाम था प्यूर्टो डी लॉस एस्पानोलेस जिसका अर्थ होता है ‘स्पैनियार्ड्स का पोर्ट’ या ‘स्पेन के लोगों की बस्ती’। 16वीं और 17वीं शताब्दी में स्पेन ने त्रिनिदाद और टोबैगो द्वीपों पर कब्जा कर लिया था और यहां स्पैनिश उपनिवेश बसाए गए।
स्पैनिश लोगों के आने से पहले इस क्षेत्र को अमेरिन्डियन जनजातियों द्वारा बसाया गया था। उनकी बस्ती का नाम कुमुकुरापो था। धीरे-धीरे स्पैनिश प्रभाव बढ़ता गया और इस इलाके का नाम बदलकर प्यूर्टो डी एस्पाना हो गया।
ब्रिटिश शासन और नाम में बदलाव
1797 में ब्रिटिश सेना ने त्रिनिदाद पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों ने इस शहर को ‘प्यूर्टो डी एस्पाना’ की बजाय अपने उच्चारण के अनुसार ‘पोर्ट ऑफ स्पेन’ कहना शुरू कर दिया। यही नाम धीरे-धीरे आधिकारिक बन गया और आज तक इस शहर को इसी नाम से जाना जाता है।
भारत से गहरा संबंध
इस शहर की खास बात ये है कि यहां की लगभग 40 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल की है। 19वीं सदी में जब ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से मजदूरों को करार पर त्रिनिदाद ले जाया गया था, तब भारतीय समुदाय की नींव यहां पड़ी। आज वे लोग इस देश की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
एक नाम, कई कहानियां
‘पोर्ट ऑफ स्पेन’ सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि इतिहास की उन परतों को बयां करता है, जिसमें स्पैनिश उपनिवेश, ब्रिटिश शासन और भारतीय प्रवासी संस्कृति तीनों की झलक मिलती है। यह शहर विश्व के उन अनोखे स्थलों में से है, जहां इतिहास, भूगोल और संस्कृति का अद्भुत मेल देखने को मिलता है।

