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रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा सदर अस्पताल में हुई उस हृदयविदारक घटना पर कड़ा रुख अख्तियार किया है, जिसने पांच मासूम बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया। जस्टिस गौतम कुमार चौधरी की अदालत ने दीपक हेंब्रम की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस जघन्य लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों पर तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाए।
क्या है पूरा मामला
मामला पिछले साल अक्टूबर का है, जब चाईबासा सदर अस्पताल के ब्लड बैंक से रक्त चढ़ाए जाने के बाद पांच बच्चे एचआईवी (HIV) पॉजिटिव पाए गए थे। इनमें एक सात वर्षीय मासूम भी शामिल है, जो पहले से ही थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा था। थैलेसीमिया पीड़ितों को जीवित रहने के लिए नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत होती है, लेकिन अस्पताल की लापरवाही ने उन्हें एक ऐसी बीमारी दे दी जिसका कोई इलाज नहीं है।
अदालत में पुलिस की ढिलाई उजागर
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि वे महीनों से चाईबासा सदर थाना प्रभारी के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन पुलिस ने अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की है। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए निर्देश दिया कि यदि मामले में संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) बनता है, जो कि इस मामले में स्पष्ट है, तो बिना किसी देरी के कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल
इससे पहले भी हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य के स्वास्थ्य सचिव और सिविल सर्जन से रिपोर्ट मांगी थी। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई थी कि ब्लड बैंक में स्क्रीनिंग की प्रक्रिया में भारी खामियां थीं। इस मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए सिविल सर्जन और ब्लड बैंक प्रभारी को निलंबित कर दिया था, लेकिन अब हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद दोषियों पर आपराधिक मुकदमा चलने का रास्ता साफ हो गया है।

