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Gumla News : नान्दो देवी सरस्वती शिशु मंदिर में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व अत्यंत उत्साह और गरिमा के साथ संपन्न हुआ। इस विशेष अवसर पर, विद्यालय परिसर में विद्यार्थियों, शिक्षकों और प्रबंधन समिति के सदस्यों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय के सचिव अभिमन्यु जायसवाल, संरक्षक जगन्नाथ प्रसाद, राजेश केसरी, समिति सदस्य उमेश ताम्रकार तथा अभिभावक प्रतिनिधि सुभाष ठाकुर द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। यह आध्यात्मिक कृत्य गुरु पूर्णिमा के निहितार्थों को प्रतिध्वनित करता था।
इस अवसर पर, संरक्षक जगन्नाथ प्रसाद ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में जीवन में गुरु की अपरिहार्य भूमिका पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने गुरु को मात्र ज्ञान प्रदाता ही नहीं, अपितु सही दिशा निर्देशक, नैतिक मूल्यों के संवाहक और जीवन की चुनौतियों का सामना करने हेतु सशक्त बनाने वाले व्यक्तित्व के रूप में रेखांकित किया। श्री प्रसाद ने गुरु को समाज का आधारस्तंभ बताते हुए उनके निःस्वार्थ योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
तत्पश्चात, राजेश केसरी ने अपने वक्तव्य में माता-पिता को प्रथम गुरु की संज्ञा दी। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि माता-पिता के मार्गदर्शन का अक्षरशः पालन कर ही व्यक्ति जीवन में सफलता के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त कर सकता है।
वहीं, आचार्य आयुष केशरी और आचार्या सोनम कुमारी ने गुरु पूर्णिमा के ऐतिहासिक तथा आध्यात्मिक महत्व पर विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने आदिगुरु महर्षि वेदव्यास के योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि कैसे उनके अथक प्रयासों से वेदों का संकलन संभव हो पाया, जिसके सम्मान में यह पावन दिवस गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने गुरु के ज्ञान और मार्गदर्शन को जीवन की सफलता का अचूक मंत्र बताया।
इस भव्य आयोजन में विद्यार्थियों द्वारा विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए, जिनमें गीत, नृत्य और लघु नाटिकाएं शामिल थीं। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से छात्रों ने अपने गुरुजनों के प्रति असीम कृतज्ञता व्यक्त की।
कार्यक्रम के अंत में, विद्यालय के सभी भैया-बहनों ने गीतों के साथ, पूर्ण अनुशासन में पंक्तिबद्ध होकर अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और समर्पण राशि अर्पित की। यह दृश्य गुरु-शिष्य परंपरा की गरिमा और अटूट बंधन का प्रतीक था, जिसने कार्यक्रम को अत्यंत भावपूर्ण बना दिया। विद्यालय के प्रधानाचार्य अजय पाणिग्राही जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया और कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा की।
अपने संबोधन में उन्होंने समाज को भी एक अप्रत्यक्ष गुरु के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि समाज से हम बहुत कुछ सीखते हैं, अतः हमें भी समाज के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए राष्ट्र और समाज के उत्थान में अपना योगदान देने का सतत प्रयास करना चाहिए। यह सफल आयोजन न केवल गुरु पूर्णिमा की मूल भावना को परिलक्षित करता है, बल्कि समृद्ध सांस्कृतिक मूल्यों और शिक्षक-छात्र के गहन संबंध को भी सुदृढ़ करता है।

