Washington, (US): किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जनता का ‘जानने का अधिकार’ सबसे पवित्र होता है, लेकिन जब बात दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोगों के काले कारनामों की आती है, तो गोपनीयता की दीवारें ऊंची हो जाती हैं। इन दिनों अमेरिका में जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी फाइलों के प्रकाशन ने न केवल वॉशिंगटन के राजनीतिक गलियारों को हिला दिया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर पारदर्शिता और सरकारी ईमानदारी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
दशकों का सच और राजनीतिक हथियार
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काली पट्टियां और अधूरा संपादन
वर्तमान में सार्वजनिक किए जा रहे दस्तावेजों में बड़े पैमाने पर ‘संपादन’ (Redaction) किया गया है। महत्वपूर्ण नाम, ईमेल, पते और यहाँ तक कि तस्वीरें भी काली पट्टियों से ढकी हुई हैं। जहाँ कुछ कानूनी बाध्यताएं समझ आती हैं, वहीं बिना किसी ठोस आधार के सूचनाएँ छिपाने से यह संदेह गहरा गया है कि क्या अभी भी किसी ‘प्रभावशाली’ चेहरे को बचाने की कोशिश की जा रही है?
कानूनों की लड़ाई: FOIA बनाम प्राइवेसी एक्ट: अमेरिकी कानून के दो स्तंभ आज आमने-सामने हैं:
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सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम (1966): जो एफबीआई और न्याय विभाग जैसे संस्थानों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है।
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गोपनीयता अधिनियम (1974): जिसका सहारा लेकर नौकरशाही निजी जानकारी और प्रतिष्ठा की रक्षा की आड़ में तथ्यों को छिपा रही है।
नौकरशाही का पेच और ऑनलाइन अटकलें
इस पूरी प्रक्रिया में एफबीआई से लेकर संघीय नौकरशाही की अलग-अलग एजेंसियां शामिल हैं, जिनमें एकरूपता का अभाव है। एक एजेंसी जिस जानकारी को जनता के लिए सुरक्षित मानती है, दूसरी उसे ‘गोपनीयता’ के नाम पर सेंसर कर देती है। जब तक ये कानूनी बाधाएं पार नहीं होतीं और पूर्ण पारदर्शिता नहीं आती, तब तक इंटरनेट पर अटकलों और साजिशों (Conspiracy Theories) का दौर थमता नजर नहीं आता।
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