Social News: मानव के लिए धरती पर मौजूद सभी प्रजातियों के बारे में पूरी जानकारी हासिल करना असंभव साबित हो रहा है। कई बार एक ही जीव को लेकर नई-नई बातें सामने आती हैं। ऐसा ही मामला जिराफ़ का है। हाल की एक रिसर्च ने बड़ा खुलासा किया है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि वास्तव में जिराफ़ की एक नहीं बल्कि चार अलग-अलग प्रजातियां मौजूद हैं।

जिराफ़ की एक नहीं बल्कि चार अलग-अलग प्रजातियां मौजूद

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने इस नतीजे की पुष्टि करते हुए जिराफ़ की चार प्रजातियों को मान्यता दी है। इनमें उत्तरी जिराफ़, रेटिकुलेटेड जिराफ़, मसाई जिराफ़ और दक्षिणी जिराफ़ शामिल हैं। यह जानकारी हैरान करने वाली है क्योंकि लंबे समय से जिराफ़ को सिर्फ एक ही प्रजाति माना जाता था, जिसमें नौ उप-प्रजातियों का ज़िक्र किया जाता था। शोधकर्ताओं का कहना है कि भले ही ये प्रजातियां दिखने में काफी हद तक एक जैसी लगती हैं, लेकिन इनके बीच अंतर उतना ही गहरा है जितना भूरे भालू और ध्रुवीय भालू के बीच होता है। नामीबिया के विंडहोक स्थित माइकल ब्राउन, जिन्होंने इस अध्ययन का नेतृत्व किया, ने बताया कि प्रत्येक प्रजाति की अपनी विशिष्ट जनसंख्या, खतरे और संरक्षण की आवश्यकताएं हैं।

इन चारों प्रजातियों का वितरण अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों में है। उत्तरी जिराफ़ चाड, कैमरून, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिण सूडान और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में पाया जाता है। इसके सिर पर लंबे और पतले हड्डी जैसे ढांचे यानी ओसिकोन्स होते हैं। रेटिकुलेटेड जिराफ़ सोमालिया, केन्या और इथियोपिया में मिलता है और यह चारों में सबसे ऊंचा है, जिसकी ऊंचाई छह मीटर तक पहुंच सकती है। मसाई जिराफ़ केन्या, तंजानिया और जाम्बिया में पाया जाता है, इसकी खाल पर पत्तियों जैसे पैटर्न बने होते हैं। वहीं दक्षिणी जिराफ़ अंगोला, नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और जाम्बिया में पाया जाता है और यह संख्या के लिहाज से सबसे ज्यादा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जिराफ़ की ये प्रजातियां लगभग 2.3 से 3.7 लाख साल पहले एक-दूसरे से अलग होकर विकसित होने लगी थीं।

जंगली वातावरण में ये प्रजातियां आम तौर पर आपस में प्रजनन नहीं करतीं, हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में ऐसा संभव पाया गया है। चिंता की बात यह है कि पिछले सौ सालों में जिराफ़ों की संख्या में भारी गिरावट आई है। अफ्रीकी महाद्वीप में अब मात्र 1.17 लाख जंगली जिराफ़ बचे हैं। जब इन्हें चार अलग-अलग प्रजातियों में विभाजित किया जाता है तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि हर प्रजाति की जनसंख्या खतरे के स्तर पर और घट जाती है। हालांकि, इस खोज से एक उम्मीद भी जुड़ी है। अलग-अलग प्रजातियों की पहचान होने से इनके संरक्षण के लिए अलग रणनीतियां बनाई जा सकती हैं।

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