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World News: बांग्लादेश की राजधानी ढाका के पुराने हिस्से की तंग गलियों के बीच स्थित ढाकेश्वरी देवी का मंदिर केवल एक धार्मिक ढांचा नहीं है, बल्कि यह बंगाल की साझा विरासत का सबसे बड़ा जीवित प्रमाण है। यह वह स्थान है जिसने न केवल लाखों लोगों को आस्था दी, बल्कि इस विशाल शहर को ‘ढाका’ जैसा नाम भी दिया। आज के कठिन समय में, जब पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और संस्कृति पर सवाल उठ रहे हैं, तब ढाकेश्वरी मंदिर की दीवारें यह याद दिलाती हैं कि इस भूमि की जड़ें कितनी प्राचीन और गहरी हैं।
नाम की उत्पत्ति: जब ‘ढाक’ की देवी बन गईं शहर की कुलदेवी
‘ढाकेश्वरी’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘ढाका की ईश्वरी’ या देवी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है। कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु ने माता सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े किए थे, तब उनके मुकुट का रत्न इसी पवित्र स्थान पर गिरा था। इतिहासकारों के अनुसार, 12वीं शताब्दी में सेन वंश के राजा बल्लाल सेन ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। लोककथा है कि राजा ने घने ‘ढाक’ के जंगलों के बीच देवी को छिपा हुआ देखा था, जिसके बाद यहां भव्य मंदिर बना और यही ‘ढाक’ शब्द कालांतर में ‘ढाका’ बन गया।
विभाजन का घाव: जब 900 साल पुरानी प्रतिमा को कोलकाता जाना पड़ा
1947 का भारत विभाजन इस मंदिर के लिए एक काला अध्याय साबित हुआ। बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा और असुरक्षा के बीच, मंदिर के मुख्य पुजारी ने सदियों पुराने मूल विग्रह (मूर्ति) को सुरक्षित रखने के लिए उसे गुप्त रूप से भारत लाने का कठिन निर्णय लिया। आज वह ऐतिहासिक प्रतिमा कोलकाता के कुम्हारटुली इलाके में स्थापित है। ढाका के वर्तमान मंदिर में स्थापित प्रतिमा उसी प्राचीन वैभव की प्रतिकृति है, जो आज भी भक्तों को शक्ति और शांति का संदेश देती है।
संघर्ष से ‘राष्ट्रीय मंदिर’ के दर्जे तक का सफर
1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान, जब पाकिस्तानी सेना ने ढाका के कई मंदिरों को निशाना बनाया, तब ढाकेश्वरी मंदिर हिंदू समुदाय की आस्था का सबसे मजबूत किला बनकर उभरा। इसकी सांस्कृतिक अहमियत को देखते हुए 1996 में इसे ‘ढाकेश्वरी राष्ट्रीय मंदिर’ का दर्जा दिया गया। यहां प्रतिदिन बांग्लादेश का राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है, जो यह दर्शाता है कि यह मंदिर किसी एक धर्म का नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की विरासत का हिस्सा है।
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आज ढाकेश्वरी मंदिर विभाजन, पलायन और अस्तित्व के संघर्ष की कहानियां अपने भीतर समेटे हुए है। वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, यह मंदिर दुनिया को यह बताता है कि आस्था और संस्कृति की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि उन्हें नफरत की कोई भी आंधी पूरी तरह मिटा नहीं सकती।

