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India News: दिल्ली में हुए धमाके (Delhi Blast) की जांच हर दिन एक नए मोड़ पर पहुंच रही है। अब एजेंसियों को ऐसे संकेत मिले हैं जो पूरे मामले को और जटिल बना देते हैं। अल-फलाह यूनिवर्सिटी की लैब में ग्लासवेयर एंट्री, कंज्यूमेबल रिकॉर्ड और केमिकल उठान का डेटा आपस में मेल नहीं खा रहा है। यानी लैब में जो सामान आया, उसका इस्तेमाल या टूट-फूट का रिकॉर्ड सामने नहीं है, और कई चीज़ें छोटे-छोटे बैच में बाहर ले जाई गईं।
लैब रिकॉर्ड में गड़बड़ी, कांच का सामान बाहर ले जाने पर शक
सूत्रों के मुताबिक कुछ ग्लास आइटम की एंट्री तो दर्ज हुई, लेकिन उनका इस्तेमाल या नुकसान का कोई रिकॉर्ड नहीं है। इससे शक गहरा रहा है कि आरोपी मेडिकल स्टडी या लैब वर्क के नाम पर धीरे-धीरे केमिकल और कंटेनर बाहर ले जाते थे। ये वही उपकरण हैं जिन्हें सटीक मिश्रण और स्टेबलाइजेशन टेस्टिंग में इस्तेमाल किया जाता है।
जांच कर रही एनआईए ने अब डॉ. मुजम्मिल अहमद गनई, डॉ. शाहीन और डॉ. अदील को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ शुरू कर दी है। एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि केमिकल कौन चुनता था, मिश्रण की वैज्ञानिक प्रक्रिया किसने तैयार की और लैब से क्या-क्या बाहर ले जाया गया।
कश्मीर में अस्पतालों और कॉलेजों के लॉकरों की तलाशी तेज
दिल्ली धमाके के बाद जम्मू-कश्मीर में भी जांच सख्त कर दी गई है। सरकारी और निजी अस्पतालों के स्टाफ लॉकरों की तलाशी ली जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं मेडिकल सेटअप का इस्तेमाल हथियार या केमिकल छुपाने के लिए तो नहीं हुआ।
एक अधिकारी ने बताया कि यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि कोई भी लॉकर गलत मकसद के लिए इस्तेमाल न हो सके। यह प्रक्रिया बुधवार से ही जारी है और गांदरबल से लेकर कुपवाड़ा तक कई अस्पतालों में तलाशी ली गई है।
जैश-ए-मोहम्मद की भूमिका, हमास जैसी रणनीति का शक
जांच में यह भी सामने आया है कि जैश-ए-मोहम्मद का मॉड्यूल अस्पतालों को हथियारों के ठिकाने की तरह इस्तेमाल करना चाहता था। यह वही तरीका है जिसे हमास अपनाता है—जहां नागरिक इलाकों, अस्पतालों और स्कूलों को हथियारों की ढाल बनाया जाता है।
दिल्ली ब्लास्ट केस में गिरफ्तार आरोपी मुजम्मिल के फोन से बम बनाने से जुड़े 42 वीडियो बरामद किए गए हैं। एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क हाई-इंटेलेक्ट साइंटिफिक मॉड्यूल की तरह काम कर रहा था।
10 नवंबर को लाल किला मेट्रो स्टेशन की पार्किंग के पास हुए कार ब्लास्ट में 15 लोगों की मौत हुई थी और 20 से ज्यादा घायल हुए थे। अब तक 6 लोगों की गिरफ्तारी की जा चुकी है।
पूर्व डीजीपी का कहना है कि 1990 के दशक में भी आतंकी अस्पतालों का इस्तेमाल हथियार छिपाने के लिए करते थे, जिसे बाद में सेना और पुलिस ने पूरी तरह खत्म किया था। अब फिर ऐसा नेटवर्क खड़ा होने की कोशिश की जा रही थी।
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