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रांची: प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (PLFI) के आर्थिक साम्राज्य को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने संगठन की लेवी (जबरन वसूली) की राशि को शेल कंपनियों के जरिए निवेश करने के आरोपी फुलेश्वर गोप की जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया।
क्या है ‘शिव आदि शक्ति’ का सच
मामला ‘शिव आदि शक्ति इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी से जुड़ा है। राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) ने कोर्ट को बताया कि यह कोई वास्तविक कारोबार करने वाली कंपनी नहीं, बल्कि एक शेल कंपनी थी। इसका मुख्य उद्देश्य PLFI के सुप्रीमो दिनेश गोप द्वारा वसूली गई लेवी की करोड़ों की राशि को वैध (White) बनाना था। जांच में खुलासा हुआ कि इस कंपनी में दिनेश गोप की पत्नी हीरा देवी भी निदेशक थीं, जो संगठन और कंपनी के बीच सीधे सांठगांठ का पुख्ता सबूत है।
आरोपी की दलील और एनआईए का पलटवार
फुलेश्वर गोप के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि कंपनी में उनकी हिस्सेदारी मात्र 5 प्रतिशत थी और उनका उग्रवादी गतिविधियों से कोई सीधा संबंध नहीं है। हालांकि, एनआईए के अधिवक्ताओं ने जोरदार विरोध करते हुए कहा कि फुलेश्वर इस पूरे वित्तीय नेटवर्क का एक अहम हिस्सा था और उसने अवैध धन को ठिकाने लगाने में सक्रिय भूमिका निभाई।
गवाह से कैसे बना आरोपी
दिलचस्प बात यह है कि एनआईए ने शुरुआती जांच के बाद फुलेश्वर गोप को पहले पूरक आरोप पत्र में गवाह बनाया था। लेकिन जैसे-जैसे जांच की परतें खुलीं, उसके खिलाफ ऐसे ठोस सबूत मिले कि उसे दूसरे पूरक आरोप पत्र में मुख्य आरोपियों की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया। फिलहाल वह पिछले चार वर्षों से जेल में बंद है। अदालत ने माना कि उग्रवादी संगठनों को आर्थिक ऑक्सीजन देने वाले ऐसे नेटवर्क समाज और देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं, इसलिए ऐसे मामलों में नरमी नहीं बरती जा सकती।

