Patna News: बिहार में सत्ता का इतिहास आज 75 साल का हो चुका है। यह सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने की कहानी नहीं, बल्कि समाज, जाति, गठबंधन राजनीति और नेतृत्व शैली के लगातार बदलते चेहरे की बड़ी तस्वीर है।

बिहार के तीन बड़े युग: श्रीकृष्ण सिंह से नीतीश कुमार तक की पूरी कहानी

1946 में श्रीकृष्ण सिंह से शुरू हुई यह यात्रा आज नीतीश कुमार के सबसे लंबे शासनकाल तक पहुंच चुकी है। इन वर्षों में बिहार ने स्थिरता भी देखी, उथल-पुथल भी, और ऐसे दौर भी जब मुख्यमंत्री बदलते-बदलते लोग थक गए।

श्रीकृष्ण सिंह- बुनियाद रखने वाला स्वर्णकाल

आधुनिक बिहार की नींव जिस नेता ने रखी, वह श्रीकृष्ण सिंह थे। लगभग 14 साल 9 महीनों का उनका कार्यकाल राज्य के लिए स्थिरता का सबसे बड़ा दौर माना जाता है। इस दौरान उद्योग, शिक्षा और प्रशासनिक ढांचे की मजबूत शुरुआत हुई। उनके लंबे शासन में बिहार ने पहली बार महसूस किया कि स्थिर नेतृत्व किस तरह विकास का रास्ता आसान बना सकता है।

1960–80 का दौर- बार-बार बदलते मुख्यमंत्री और अस्थिर राजनीति

साठ और सत्तर के दशक में बिहार की राजनीति उथल-पुथल से भरी रही।
कुछ प्रमुख नाम-

• दीप नारायण सिंह – सिर्फ 18 दिन
• बी.पी. मंडल – 4 महीने
• कर्पूरी ठाकुर – दो बार, पर छोटे कार्यकाल
• जगन्नाथ मिश्रा, रामसुंदर दास, अब्दुल गफूर, बिंदेश्वरी दुबे – छोटी-छोटी सरकारें

यह वह समय था जब सत्ता संघर्ष, जातीय खिंचतान और केंद्रीय राजनीति की दखल इतनी गहरी थी कि सरकारें टिक ही नहीं पाती थीं। हर कुछ महीनों में नया चेहरा सामने आ जाता था।

लालू प्रसाद यादव- सामाजिक न्याय का उभार और एमवाई समीकरण

1990 में जैसे ही लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए, बिहार की राजनीति की पूरी भाषा बदल गई। उनका दौर सामाजिक न्याय के सबसे बड़े राजनीतिक प्रयोग का समय माना जाता है। लगातार 7 साल 4 महीने सीएम रहने के बाद 1997 में सत्ता उनकी पत्नी राबड़ी देवी को मिली, और 2005 तक आरजेडी युग पूरे दम से चलता रहा। लालू का करिश्मा और एमवाई समीकरण ने बिहार को एक नई पहचान दी, हालांकि इसी दौरान प्रशासनिक ढील और अपराध बढ़ने की चर्चाएं भी रहीं।

नीतीश कुमार- विकास और सुशासन का सबसे लंबा युग

2005 में बिहार ने एक निर्णायक मोड़ लिया- नीतीश कुमार को मौका देकर। और यह फैसला अगले दो दशकों तक राज्य की राजनीति पर छाया रहा। नीतीश अब तक 18 साल से ज़्यादा शासन कर चुके हैं और 25 में से सबसे लंबे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री बन गए हैं। उनके मॉडल में सड़कें, स्कूल, महिला सशक्तिकरण, कानून-व्यवस्था सुधार और आधारभूत ढांचा सबसे बड़ी पहचान बने।

नीतीश की एक खास बात यह रही कि वे गठबंधन की राजनीति में माहिर रहे- कभी भाजपा के साथ, कभी महागठबंधन में और फिर वापसी। लेकिन हर खेल में सत्ता की धुरी वे खुद बने रहे।

अस्थिरता से स्थिरता तक- बिहार की बदलती तस्वीर

1960–80 के डांवाडोल दौर के बाद बिहार को लंबे समय तक स्थिर नेतृत्व का इंतज़ार था, जिसे नीतीश कुमार ने पूरा किया। इसीलिए आज बिहार के मुख्यमंत्री इतिहास को तीन युगों में बांटा जाता है-

श्रीकृष्ण सिंह – नींव और स्थिरता
लालू प्रसाद – सामाजिक न्याय और नई राजनीति
नीतीश कुमार – सुशासन और विकास का मॉडल

तीनों अपने समय में सत्ता के सबसे प्रभावशाली चेहरे रहे और तीनों ने मिलकर बिहार की आधुनिक राजनीति की पूरी रूपरेखा तैयार की।

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