Lifestyle Desk: “जैसा अन्न, वैसा मन”—यह कहावत हम सबने सुनी है, लेकिन आयुर्वेद इससे एक कदम आगे जाकर कहता है “जैसा समय, वैसा भोजन।” आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर रात का खाना सबसे भारी और सबसे देर से खाते हैं, जो आयुर्वेद के सिद्धांतों के बिल्कुल उलट है। 4 मार्च 2026 को स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि रात का गलत खान-पान न केवल आपकी नींद उड़ाता है, बल्कि शरीर में ‘तामसिक’ प्रवृत्तियों को भी जन्म देता है।

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अग्नि का विज्ञान: क्यों जरूरी है हल्कापन? आयुर्वेद का मुख्य सिद्धांत ‘जठराग्नि’ (पाचन शक्ति) पर आधारित है। जिस तरह सूर्य की मौजूदगी में प्रकृति सक्रिय रहती है, उसी तरह दिन में हमारी पाचन अग्नि तेज होती है। लेकिन सूर्यास्त के बाद यह अग्नि मंद पड़ने लगती है। चरक संहिता में स्पष्ट कहा गया है—“लघु स्निग्धं च रात्रौ भोजनम्”, यानी रात का खाना हल्का और सुपाच्य होना चाहिए। अगर हम रात में भारी या तला-भुना भोजन करते हैं, तो मंद अग्नि उसे पचा नहीं पाती, जिससे शरीर में ‘आम’ (टॉक्सिन्स) बनने लगते हैं।

क्या खाएं और किससे बचें? आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार, रात के खाने में मूंग दाल की खिचड़ी, सब्जियों का सूप, दलिया या पतली रोटी सबसे उत्तम है। ये आहार न केवल जल्दी पचते हैं, बल्कि शरीर को गहरी नींद के लिए तैयार करते हैं। वहीं, रात के समय दही, मांसाहार, मिठाई और बासी भोजन से बचना चाहिए। दही रात में कफ बढ़ाता है, जो सांस की समस्याओं और जोड़ों के दर्द का कारण बन सकता है।

समय का गणित: 6 से 8 का नियम आयुर्वेद केवल ‘क्या’ पर नहीं, बल्कि ‘कब’ पर भी जोर देता है। सोने से कम से कम 2-3 घंटे पहले भोजन कर लेना आदर्श माना जाता है। शाम 6 से 8 बजे के बीच किया गया डिनर मेटाबॉलिज्म को सुचारू रखता है। यदि आप देर रात खाते हैं, तो शरीर भोजन पचाने में इतनी ऊर्जा लगा देता है कि आपके अंगों को मरम्मत (Repair) का समय ही नहीं मिल पाता।

अतः, यदि आप लंबी उम्र और निरोगी काया चाहते हैं, तो आज से ही अपनी रात की थाली को हल्का और समय को सही करें।

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