आम आदमी पार्टी (आप) के भीतर हाल ही में हुए ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम ने देश की सियासत को एक नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है। ‘आप’ के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद दिल्ली से लेकर पंजाब तक हलचल तेज है। हालांकि, ऊपरी तौर पर यह कदम भाजपा के लिए राज्यसभा में संख्यात्मक मजबूती लेकर आया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग इसे कांग्रेस के लिए संजीवनी के तौर पर देख रहा है। जानकारों का मानना है कि इस बिखराव से पैदा हुए शून्य को कांग्रेस चार राज्यों में अपनी वापसी के लिए इस्तेमाल कर सकती है।
बीजेपी को सिर्फ राज्यसभा में फायदा
राघव चड्ढा के नेतृत्व में हुए इस दल-बदल में स्वाति मालीवाल, संदीप पाठक और हरभजन सिंह जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इन नेताओं के जाने से ‘आप’ को संगठनात्मक स्तर पर बड़ी चोट लगी है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकांश नेताओं का अपना कोई मजबूत जमीनी जनाधार नहीं है, जिसके कारण भाजपा को तत्काल वोट बैंक का बड़ा फायदा मिलता नहीं दिख रहा है। लेकिन, कांग्रेस के लिए यह स्थिति बिल्कुल अलग है। ‘आप’ का उदय कांग्रेस विरोधी आंदोलन से हुआ था और उसने दिल्ली व पंजाब जैसे राज्यों में कांग्रेस की ही जगह ली थी। अब जब ‘आप’ में टूट हुई है, तो कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश में जुट गई है।
चार राज्यों में फिर बना सकती मजबूत आधार
राजनैतिक पंडितों के अनुसार, पंजाब, गुजरात, गोवा और दिल्ली—ये वो चार राज्य हैं जहां कांग्रेस को फिर से मजबूत आधार मिल सकता है। पंजाब में किसान आंदोलन के चलते भाजपा की पकड़ फिलहाल सीमित है, ऐसे में ‘आप’ की कमजोरी का सीधा लाभ कांग्रेस उठा सकती है। गुजरात और गोवा में भी, जहां ‘आप’ ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई थी, वहां अब कांग्रेस को पुनर्गठित होने का मौका दिख रहा है। दिल्ली की बात करें तो, कांग्रेस अपने पुराने दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक को फिर से साधने की रणनीति पर काम कर रही है।
कुल मिलाकर, आम आदमी पार्टी का यह संकट सिर्फ एक पार्टी की अंदरूनी टूट नहीं है, बल्कि यह विपक्षी खेमे के भीतर शक्ति संतुलन बदलने का बड़ा संकेत है। भाजपा को भले ही राज्यसभा में संख्या मिल गई हो, लेकिन कांग्रेस इसे अपने जनाधार को बढ़ाने के एक बड़े राजनीतिक अवसर के रूप में देख रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस इस ‘वॉकओवर’ का फायदा उठाकर दिल्ली और पंजाब जैसे अपने पुराने गढ़ों को फिर से फतह कर पाती है या नहीं।
क्या कहना है राजनीतिक विशेषज्ञों का?
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि कांग्रेस अब उन मतदाताओं पर फोकस कर रही है जो ‘आप’ की ओर चले गए थे। विशेष रूप से मध्यम वर्ग और दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस अपनी सक्रियता बढ़ा रही है। ‘आप’ की इस टूट ने कांग्रेस को यह तर्क देने का मौका दे दिया है कि भाजपा के खिलाफ केवल वही एक स्थिर और राष्ट्रीय विकल्प है। आने वाले विधानसभा चुनावों में इस दलबदल का असर साफ तौर पर देखने को मिल सकता है।



