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New Delhi: अक्सर यह माना जाता है कि माता-पिता की संपत्ति में बच्चों का हिस्सा तय होता है, लेकिन कानूनी हकीकत इससे काफी अलग है। भारतीय कानून के अनुसार, हर प्रकार की प्रॉपर्टी पर बच्चों को अधिकार नहीं मिलता। सारा मामला इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति ‘पैतृक’ है या ‘स्व-अर्जित’। यही सूक्ष्म अंतर यह तय करता है कि आपको संपत्ति पर जन्मजात हक मिलेगा या आप केवल उम्मीद ही रख सकते हैं।
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स्व-अर्जित संपत्ति पर पिता का एकाधिकार
अगर पिता ने अपनी मेहनत की कमाई से कोई घर, जमीन या संपत्ति खरीदी है, तो उसे ‘स्व-अर्जित’ संपत्ति माना जाता है। इस पर पिता का पूर्ण नियंत्रण होता है और वे इसे अपनी मर्जी से किसी को भी दे सकते हैं या बेच सकते हैं। कानून के मुताबिक, पिता चाहें तो अपने बच्चे को इस संपत्ति से पूरी तरह बेदखल भी कर सकते हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार, यदि पिता को अपने पिता से विरासत में कोई व्यक्तिगत संपत्ति मिली है, तो उसे भी उनकी निजी संपत्ति माना जाता है, न कि बच्चों का उस पर कोई कानूनी दावा होता है।
पैतृक संपत्ति और जन्म का अधिकार
स्व-अर्जित संपत्ति के विपरीत, ‘पैतृक संपत्ति’ वह होती है जो बिना किसी बंटवारे के पिता के पक्ष की चार पीढ़ियों (पिता, दादा, परदादा और उससे ऊपर) से चली आ रही हो। ऐसी संपत्ति पर बच्चों का जन्म से ही कानूनी अधिकार होता है। पिता ऐसी संपत्ति को अपनी मर्जी से न तो किसी एक व्यक्ति को दे सकते हैं और न ही बिना सबकी सहमति के बेच सकते हैं। इसे बेचने या बांटने के लिए परिवार के सभी सदस्यों की रजामंदी अनिवार्य होती है।
वसीयत की भूमिका
यदि संपत्ति स्व-अर्जित है और पिता की मृत्यु बिना किसी वसीयत (Intestate) के हो जाती है, तभी बच्चों को ‘क्लास-1’ उत्तराधिकारी के रूप में उसमें हिस्सा मिलता है। हालांकि, यदि पिता ने अपनी वसीयत पहले ही बना ली है, तो कानून पूरी तरह से वसीयत में लिखे शब्दों का ही पालन करेगा और बच्चों के पास दावे का कोई आधार नहीं रह जाएगा।
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