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World News: अमेरिकी राजनीति के गलियारों में इस समय एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या डोनाल्ड ट्रंप आधुनिक दौर के ‘नीरो’ बनते जा रहे हैं? जेफरी एपस्टीन फाइल्स से जुड़े हालिया खुलासों ने न केवल ट्रंप के पुराने संबंधों को उजागर किया है, बल्कि उनकी सत्ता और नैतिकता पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। न्यू टेस्टामेंट की विदुषी और सामाजिक कार्यकर्ता लिज़ थियोहारिस ने एक लेख के जरिए ट्रंप पर तीखा हमला बोला है।
लेखिका का तर्क है कि जिस तरह प्राचीन रोमन सम्राट नीरो के शासन में सत्ता, यौन हिंसा और भय का गठजोड़ था, ठीक वैसा ही मेल आज की अमेरिकी राजनीति में दिखाई दे रहा है।
यौन शोषण को सत्ता का हथियार बनाना: नीरो से ट्रंप तक का सफर
थियोहारिस के अनुसार, तानाशाहों ने हमेशा से ही राजनीतिक शक्ति के साथ-साथ यौन शोषण को दमन के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। एपस्टीन प्रकरण और महिलाओं को लेकर ट्रंप के पुराने बयान इसी भयावह मानसिकता की ओर इशारा करते हैं। लेख में तुलना की गई है कि जैसे नीरो ने रोम की आग का दोष ईसाइयों पर मढ़ा था, वैसे ही ट्रंप प्रवासियों, ट्रांसजेंडर समुदाय और गरीबों को निशाना बनाकर “बलि का बकरा” बनाने की राजनीति कर रहे हैं। इसे “फिडलिंग व्हाइल अमेरिका बर्न्स” यानी संकट के समय शासक की गैर-जिम्मेदारी करार दिया गया है।
बाइबिल के संदर्भों का हवाला देते हुए थियोहारिस ने चेतावनी दी है कि जब धर्म का उपयोग दमनकारी नीतियों को सही ठहराने के लिए किया जाता है, तो समाज का पतन निश्चित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईसाई धर्म का मूल संदेश न्याय और करुणा है, न कि बहिष्कार। आज अमेरिकी समाज एक गहरे नैतिक संकट के चौराहे पर खड़ा है। अब यह वहां के मतदाताओं को तय करना है कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करेंगे या सत्ता के इस निरंकुश दुरुपयोग को स्वीकार कर इतिहास की गलतियों को दोहराएंगे। यह बहस केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर में लोकतंत्र और नैतिकता के भविष्य पर सवालिया निशान लगाती है।

